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‘वन्य जीवों को बचाते समय जीवन रक्षक किट रखें साथ’

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लखीमपुर में दुधवा टाइगर रिजर्व में ट्रैंकुलाइज गन चलाने की जानकारी देते डॉ. उत्कर्ष शुक्ला। संव? - फोटो : LAKHIMPUR
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लखीमपुर खीरी। ठंड के मौसम में गन्ने की कटाई के दौरान मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ने की आशंका के चलते दुधवा टाइगर रिजर्व और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (विश्व प्रकृति निधि) ने वन अधिकारियों और पशुपालन विभाग के डॉक्टरों के साथ एक कार्यशाला की, जिसमें विशेषज्ञों ने वन्य जीवों के बचाव के तरीके बताए। कार्यशाला में घायल वन्य जीवों के तुरंत इलाज में बरती जाने वाली आवश्यक सावधानियों के बारे में जानकारी दी गई। वन्य जीव बचाव पर शोध कर रहे आईएमटी गाजियाबाद के सहायक प्रोफेसर डॉ विनायक राम त्रिपाठी ने बचाव के दौरान अपने अनुभवों को साझा किया।
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फील्ड डायरेक्टर कार्यालय परिसर में मानव वन्य जीव संघर्ष प्रबंधन विषय पर हुई कार्यशाला में मुख्य प्रशिक्षक डॉ उत्कर्ष शुक्ला (उपनिदेशक, लखनऊ चिड़ियाघर) ने कहा कि घायल अवस्था में वन्य जीवों को बचाते समय कुछ विशेष सावधानियों का पालन करना जरूरी है। वन्य जीवों के तुरंत उपचार के लिए जीवन रक्षक किट साथ में रखें। यह भी जरूरी है कि दवाइयों के प्रयोग की सही और पूरी जानकारी भी रहे। इसके लिए निर्धारित प्रारूप पर जानकारी संचित कर लें। बचाव करने वाली टीम जंगल में पूरी तैयारी के साथ जाए और वह सभी आवश्यक उपकरणों से लैस हो। उन्होंने वन्य जीवों को ट्रैंकुलाइज करने के लिए हाल में खरीदी गई डबल बैरेल ट्रैंकुलाइज गन को चलाने के तौर-तरीकों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। कार्यशाला में दुधवा नेशनल पार्क, कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग, दक्षिण खीरी वन प्रभाग समेत राजकीय पशु चिकित्सकों ने प्रतिभाग किया। संचालन कर रहे डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के समन्वयक डॉ मुदित गुप्ता ने बताया कि तराई के जनपदों लखीमपुर, पीलीभीत और बहराइच में मानव वन्य जीव संघर्ष के पीछे लोगों में जानकारी न होना प्रमुख कारण है। बफर जोन के उपनिदेशक डॉ अनिल कुमार पटेल ने मानव वन्य जीव संघर्ष के निवारण में विभिन्न विभागों की भूमिका और समुदाय के साथ सामंजस्य बनाने पर बल दिया। कार्यशाला में डीएफओ साउथ समीर कुमार, डीएफओ कतर्नियाघाट यशवंत, परियोजना अधिकारी दबीर हसन, डॉ सर्वेश राय, डॉ बीआर निगम, डॉ प्रदीप कुमार समेत सभी रेंज के वन दरोगा, डिप्टी रेंजर और क्षेत्रीय वनाधिकारी शामिल रहे।
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दुधवा टाइगर रिजर्व ने सात लाख में खरीदी डबल बैरल ट्रैंकुलाइज गन
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन से बाहर निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पात मचाने वाले बाघ और तेंदुए जैसे हिंसक वन्य जीवों को अब आसानी से ट्रैंकुलाइज किया जा सकेगा। इसके लिए वन विभाग ने डेनमार्क से डबल बैरेल ट्रैंकुलाइज गन की खरीद की है, जिसकी लागत करीब सात लाख रुपये बताई जा रही है। इससे पहले दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के पास अपनी ट्रैंकुलाइज गन नहीं थी और दुधवा पार्क से गन उधार लेकर काम चलाया जा रहा था। हालांकि ट्रैंकुलाइज गन के इस्तेमाल के लिए मुख्य वन्य जीव संरक्षक की अनुमति लेनी होगी, जिसके बाद ही नामित पशु चिकित्सक की देखरेख मेें इसका प्रयोग किया जा सकेगा।
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ठंडक में बफर जोन से बाघ बाहर निकलकर जंगले से लगे गन्ने के खेतों में अपना ठिकाना बना लेते हैं, जिससे गन्ना समेत फसलों की रखवाली करने वाले किसानों और वन्य जीवों के बीच संघर्ष की स्थिति बन जाती है। बाघों के हमले में अब तक दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं, तो कई किसान अपनी जान गवां चुके हैं। दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के उपनिदेशक डॉ अनिल कुमार पटेल ने बताया है कि ट्रैंकुलाइज गन की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। अब ट्रैंकुलाइज गन की खरीद कर ली गर्ई है जिससे समय पर वन्य जीवों को ट्रैंकुलाइज करने में आसानी होगी। वहीं मानव और वन्य जीवों के बीच होने वाली संघर्ष की घटनाओं पर भी विराम लगेगा। दुधवा नेशनल पार्क के पास तीन ट्रैंकुलाइज गन हैं। उपनिदेशक बफर जोन ने बताया कि ट्रैंकुलाइज गन का प्रयोग मुख्य वन्य जीव संरक्षक (पीसीएफ) से अनुमति मिलने के बाद ही किया जा सकता है। पहले तो वन्य जीव को वापस जंगल में भेजने के लिए पहले हाका/शोरगुल लगाएंगे, इसके बाद भी वन्य जीव जैसे बाघ या तेंदुआ जंगल में वापस नहीं जाता है, तो पिंजड़ा लगाकर पकडने की कार्रवाई की जाएगी लेकिन इसके लिए भी पीसीएफ की अनुमति लेना जरूरी है। संवाद

लखीमपुर में एफडी कार्यालय पर मानव वन्य जीव संघर्ष को रोकने के लिए कार्यशाला में विचार रखते सहायक - फोटो : LAKHIMPUR

 

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