गोला गोकर्णनाथ। भारतीय संस्कृति में वट सावित्री पूजा का विशेष महत्व है। इस व्रत में सुहागिनें अखंड सौभाग्य की कामना के साथ पति की दीर्घायु के लिए पूजन करती हैं।
ज्योतिषाचार्य पं. रामदेव मिश्रा शास्त्री ने बताया कि हिंदू पंचांग के मुताबिक प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री का व्रत रखा जाता है। बृहस्पतिवार को वट सावित्री पूजन होगा। इसमें सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए सोलह श्रृंगार करके वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वट की पूजा करने के साथ ही वह उस पर कच्चा सूत या सफेद धागा बांधती हैं। इसके बाद वह वृक्ष की कोपलें खाकर व्रत को खोलती हैं।
इस व्रत की पृष्ठभूमि में सावित्री और सत्यवान की कथा है। सावित्री ने पति सत्यवान के जीवन को वापस पाने के लिए यमराज से संघर्ष किया था। वह तप, साहस और भक्ति से अपने पति को यमराज के पास से वापस ले आई थी। यह घटना वट वृक्ष के नीचे हुई थी। इस वजह से इस व्रत में वट वृक्ष की विशेष रूप से पूजा की जाती है।
अमरता का प्रतीक है वट वृक्ष
वट वृक्ष को अमरता और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। इसकी लंबी फैली हुई जड़ें और शाखाएं शक्ति और स्थायित्व का प्रतीक हैं। महिलाएं पति की लंबी आयु और परिवार की समृद्धि के लिए इस वृक्ष की पूजा करती हैं। वट की पूजा करने से त्रिदेवों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजन मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य पं. रामदेव मिश्रा शास्त्री ने बताया कि पांच जून को 6:57 बजे अमावस्या का प्रवेश हो रहा है। दूसरे दिन छह जून को ब्रह्म मुहूर्त से लेकर शाम को 5:38 बजे तक अमावस्या है। बृहस्पतिवार सुबह 11:36 से 12:14 तक अभिजीत मुहूर्त में पूजन शुभ है।