जंगल से सटे इलाके में खेती-बाड़ी बनी खतरे का सबब
बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। सर्दी के मौसम में एक बार फिर बाघों के आक्रामक हो जाने से वन विभाग हैरत में है। पिछले चार दिनों के अंदर जिले में बाघ के हमलों की चार घटनाओं से ‘शुगरकेन टाइगर’ की अवधारणा सच हो रही है। जिससे ग्रामीणों की रातों की नींद और दिन का चैन छीन गया है।
आमतौर से गन्ने की फसल तैयार होने के समय ही बाघ और बाघिन जंगल के आसपास गन्ने के खेतों में अपना बसेरा बना लेते हैं क्योंकि बाघ और बाघिन के प्रजनन के लिए गन्ने के खेत प्राय: सुरक्षित स्थल बन जाते हैं। यही कारण है कि गन्ने की फसल तैयार होने पर मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। तराई क्षेत्र में जंगलों की अधिकता और गन्ने की अधिक पैदावार होने से जंगल और गन्ने के खेत दोनों ही टाइगर हैबिटेट बन रहे हैं। जिसके चलते गन्ने के खेतों में अधिक समय गुजारने वाले बाघों को एक वन्यजीव विशेषज्ञ ने ‘शुगरकेन टाइगर’ का नाम दिया है।
साल 2019 में पिछले पांच-सात वर्षों की अपेक्षा बाघ हमले की घटनाएं काफी कम रहीं। दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन में भी बाघ के हमले की एक भी घटना नहीं हुई। वहीं, दक्षिण खीरी वन प्रभाग में बाघ हमले की घटनाएं हुई है। जिस कारण से अफसरों और वन कर्मियों को बाघ की निगरानी के साथ ही ग्रामीणों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ रहा है।
वर्ष 2019 में बाघ के हमले
29 दिसंबर- भीरा रेंज की बरूआ बीट गिरदा गौढ़ी के पास फसल की देख-रेख कर रहे कटैया गांव निवासी दिनेश (30) बाघ हमले में घायल।
30 दिसंबर- मोहम्मदी रेंज में खेत पर काम रहे बुधेलीनानकार निवासी बुजुर्ग लाल बिहारी (65) को बाघ ने मार डाला।
30 दिसंबर- मोहम्मदी रेंज में खेत में गन्ना छील रहे रमेश पंडित (42) बाघ हमले में घायल।
01 जनवरी 2020- भीरा रेंज की उत्तरी किशनपुर बीट में गेहूं फसल की देख-रेख कर रहे कांपटांडा गांव निवासी परागू (55) बाघ हमले में घायल।