बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। जब इंसान बाघों के इलाके में घुसेगा तो उसका हमलावर होना लाजिमी है। यही वजह है कि जंगल में लगातार बढ़ती घुसपैठ से वह आक्रामक हो रहे हैं। जिसके चलते बाघ के हमलों की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं।
दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन से सटकर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं। यहां रहने वाले लोगों के खेत तो जंगल के किनारे हैं, पर घास-फूस, जड़ी-बूूटी, लकड़ी, मशरूम आदि के लिए यह लोग पूरी तरह जंगल पर निर्भर हैं। इन्हें हासिल करने के लिए गांव के लोग बाघों के घर यानी जंगल में घुस रहे हैं। बाघ अपने इलाके में दूसरे बाघ की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करता तो इंसानों की घुसपैठ कैसे बर्दाश्त कर सकता है। यही वजह है कि जंगल में लगातार इंसानी दखलंदाजी से बाघ आक्रामक हो रहे हैं।
तराई इलाके विशेषकर दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व जंगल के आसपास मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है। जिसका मुख्य कारण बाघों के घर और इंसानी बस्ती में दूरी कम होना है। जंगल के आसपास गन्ने की खेती भी बाघों को आबादी के नजदीक आने के लिए सुरक्षित कॉरीडोर बन रही है।
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ वीपी सिंह का कहना है कि इंसान बाघ के इलाके में घुसने से बाज नहीं आ रहा है। इससे बाघों की स्वाभाविक प्रवृत्ति में बदलाव आ रहा है। उनमें आक्रमकता बढ़ रही है। मानव-बाघ संघर्ष को रोकने का एक ही उपाय है कि इंसानों और बाघों के बीच दूरी कायम रखी जाए।
आने वाले छह माह बाघ हमलों के लिए रहेंगे बेहद संवेदनशील
इस समय गन्ने की फसल पूरी तरह तैयार हो गई है। चारे के लिए खेतों में बड़ी संख्या में शाकाहारी वन्यजीव आ रहे हैं। बाघ भी इनके पीछे-पीछे आना शुरू हो गए हैं। गन्ने की फसल करीब छह महीने तक खेतों में रहती हैं। तब तक बाघों को इन खेतों में जंगली सुअर, नीलगाय आदि के रूप में पर्याप्त भोजन मिलता है। जिससे सर्दी के इन महीनों में बाघ गन्ने के खेतों को ही अपना अस्थायी ठिकाना बना लेते हैं। इसलिए गन्ना काटने के दौरान आए दिन बाघ हमले की घटनाएं होती हैं।
वन विभाग हर साल चीनी मिलों से ये अनुरोध करता है कि जंगल से सटे खेतों में किसानों की खड़ी गन्ने की फसल की पर्चियां शुरुआती दौर में ही जारी कर दी जाएं, ताकि गन्ना कटने से बाघ और इंसान के बीच टकराव की घटनाओं में कमी आ सके। जंगल में घुसपैठ रोकने के लिए वन विभाग का प्रयास हमेशा जारी रहता है।
- डॉ अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन