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...ताकि मौसम की मार से महफूज रहे फसल

Sun, 19 Apr 2015 06:56 PM IST
लखीमपुर खीरी
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मौसम के बदलते मिजाज के कारण किसानों को अपनी खेती में भी बदलाव लाना पड़ रहा है। किसानों का रुझान अब ऐसी फसलों की ओर बढ़ रहा है जिन पर मौसम की मार का असर कम से कम हो और वे कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकें। जिले में बांकेगंज के किसान लगातार फसलों को बदल-बदल कर आधुनिक खेती के प्रयोग कर रहे हैं। इस दिशा में बांकेगंज आधुनिक खेती की प्रयोगशाला बना हुआ है।
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बांकेगंज में मौसम के दुष्प्रभाव से कम प्रभावित होने वाली फसलों को लोग तरजीह दे रहे हैं। भले ही इन फसलों की खेती अभी प्रारंभिक दौर में हो लेकिन यहां के किसानों ने मौसम की मार से बचने का तरीका ढूंढ लिया है। हालांकि गन्ने पर भी बेमौसम बारिश और ओले गिरने का प्रभाव कम होता है लेकिन गन्ना मूल्य भुगतान में होने वाली देरी के कारण किसान गन्ने के अलावा दूसरी लाभकारी और नकदी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इन फसलों पर नहीं पड़ती मौसम की मार
औषधीय वनस्पतियों जैसे आर्टीमीसिया, सतावर, अकरकरा के अलावा हल्दी, केला, पपीता, जैट्रोफा, प्याज, लस्सुन, मक्का, सूरजमुखी आदि ऐसी फसलें हैं जिनपर मौसम का प्रभाव कम होता है। गेंदा फूलों की खेती पर भी खराब मौसम का ज्यादा असर नहीं होता है। इनमें लागत के हिसाब से मुनाफा ज्यादा है।
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प्रगतिशील किसान हरीश तिवारी का कहना है कि इस बार बेमौसम बारिश और ओले गिरने से रबी की फसल को भारी नुकसान हुआ है। इसके चलते मौसम की मार से बेअसर रहने वाली आर्टीमीसिया की खेती अपनाई है।
प्रगतिशील किसान प्रेम बिहारी लाल कहते हैं कि लगातार मौसम में आ रहे बदलाव के कारण ऐसी फसलों की ओर रुख करना जरूरी हो गया है जिन पर मौसम का असर कम हो। इसीलिए हमने आर्टीमीसिया और केले की खेती की।
किसान धीरेंद्र मौर्या का कहना है कि औषधीय खेती पर खराब मौसम का असर ज्यादा नहीं पड़ता। मौसम में आ रहे बदलाव को देखते हुए हमने आर्टीमीसिया, सतावर, अकरकरा, जैट्रोफा और केले की खेती शुरू की है।
किसान राजीव सिन्हा किसानों को सलाह देते हैं कि वे परंपरागत खेती से हटकर ऐसी फसल उगाएं जिन पर मौसम की मार कम हो। औषधीय खेती के अलावा केला, हल्दी, पपीता आदि की खेती अच्छा विकल्प हो सकते हैं।   
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुहैल ने बताया कि यूं तो मौसम की मार से सभी फसलें प्रभावित होती हैं लेकिन आर्टीमीसिया, जैट्रोफा, सतावर, हल्दी आदि फसलों पर मौसम का प्रभाव कम पड़ता है। मौसम के बदलते मिजाज से परंपरागत फसलों का विकल्प तलाश करना जरूरी हो गया है।
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