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वनवीरपुर के जंगल में छिपे अंग्रेजों को क्रांतिकारियों ने घाट उतारा था मौत के

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डॉ. रामपाल सिंह
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1857 की क्रांति के असर से अछूता नहीं था खीरी
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अंग्रेजों से किनारा करने लगे थे राजा, नहीं दी थी शरण
लखीमपुर खीरी। 10 मई 1857 की क्रांति मेरठ से शुरू जरूर हुई थी, लेकिन उसके असर से खीरी भी अछूता नहीं रहा था। यहां की कई रियासतों के राजा अंग्रेजों की छत्रछाया में होने के बावजूद उनका साथ छोड़ने लगे थे। नतीजा यह रहा कि वनवीर के जंगल में छिपे अंग्रेजों को क्रांतिकारियों ने मौत के घाट उतार दिया था।
स्वतंत्रता संघर्ष में खीरी का इतिहास लिखने वाले डॉ. रामपाल सिंह बताते हैं कि 10 मई 1857 में जब क्रांति की शुरुआत हुई तो ओयल रियासत के राजा अनिरुद्ध सिंह और धौरहरा की जांगड़ा रियासत के राजा इंद्र विक्रम सिंह ने प्रत्यक्ष रूप से तो क्रांति में भाग नहीं लिया लेकिन अंग्रेजों की कोई सहायता नहीं की। डॉ. रामपाल सिंह का कहना है कि जब मई 1857 में पड़ोसी जनपद सीतापुर पर क्रांतिकारियों न अपना पूर्ण नियंत्रण कर लिया तो सीतापुर से मेजर हर्षा के साथ भगोड़े अंग्रेजों की एक टुकड़ी ओयल आई और राजा अनिरुद्ध सिंह से शरण की याचना की। राजा ने इन राष्ट्र शत्रुओं को न तो अपने यहां शरण दी और न ही उन्हें शरणागत समझकर कोई हानि पहुंचाई। इसके बाद अंग्रेजों की टुकड़ी धौरहरा पहुंची और जांगड़ा रियासत के राजा इंद्र विक्रम सिंह से मदद मांगी। इस पर राजा ने उन्हें मटेरा में शरण दे दी। इसके बाद कुछ अंग्रेज मल्लापुर से भागकर मटेरा आ गए। अंग्रजों की संख्या ज्यादा हो जाने के कारण उनकी सुरक्षा करना कठिन हो गया। इस पर राजा ने उन्हें लखनऊ भेजा लेकिन खैराबाद के पास क्रांतिकारियों के डर से अंग्रेज भाग खड़े हुए और निघासन तहसील के बनवीरपुर ग्राम के निकट जंगल में छिप गए। लेकिन वे बच नहीं पाए। क्रांतिकारियों ने उन्हें घेरकर मार डाला।
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1857 की क्रांति का व्यापक प्रभाव खीरी में कई साल बाद दिखा। लेकिन असर क्रांति की शुरुआत से ही दिखने लगा था। ओयल रियासत के राजा अनिरुद्ध सिंह व धौरहरा के राजा इंद्र विक्रम सिंह ने अंग्रेजों से कन्नी काटनी शुरू कर दी थी। मितौली के राजा लोने सिंह ने अंग्रेजों से सीधा लोहा लिया।
- डॉ. रामपाल, प्रवक्ता (अवकाश प्राप्त) इतिहास विभाग, गुरुनानक इंटर कॉलेज
10 एलकेएच 30
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