पलियाकलां। कभी घर, खेत और परिवार तक सीमित रहने वाली दुधवा क्षेत्र की थारू बेटियां आज जंगल की पहचान बन चुकी हैं।
वन विभाग की पहल और इको टूरिज्म के विस्तार ने उन्हें ऐसा मंच दिया है, जहां वे नेचर गाइड बनकर देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को दुधवा के जंगलों, वन्यजीवों और जैव विविधता से रूबरू करा रही हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ी है, बल्कि समाज में उनकी पहचान और सम्मान भी मजबूत हुआ है।
दुधवा टाइगर रिजर्व और बफर जोन से सटे गांवों की कई युवतियां प्रशिक्षण प्राप्त कर नेचर गाइड के रूप में काम कर रही हैं। सफारी के दौरान वे पर्यटकों को बाघ, गैंडा, बारहसिंगा और दुर्लभ पक्षियों की जानकारी देती हैं। उनकी जानकारी और आत्मविश्वास से प्रभावित होकर पर्यटक भी उनकी सराहना करते हैं।
दुधवा की नेचर गाइड देवकी राना और घूमनी राना बताती हैं कि पहले उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वे जंगल में पर्यटकों का मार्गदर्शन करेंगी। अब यह काम उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहा है और परिवार व समाज में नई पहचान भी दिला रहा है।
घूंघट से गाइड तक का सफर
तराई क्षेत्र की जिन महिलाओं के लिए कभी घूंघट परंपरा का हिस्सा था, वे आज आत्मविश्वास के साथ पर्यटकों से संवाद कर रही हैं। जंगल की पगडंडियों पर सफारी के दौरान वे वन्यजीवों और स्थानीय संस्कृति की जानकारी साझा करती हैं। यह बदलाव क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण की नई तस्वीर पेश कर रहा है।
नेचर गाइड बनने के साथ-साथ कई थारू महिलाएं होम स्टे और हस्तशिल्प से भी जुड़ी हैं। पर्यटकों को स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक भोजन और लोकजीवन से परिचित कराने में उनकी अहम भूमिका है। इससे महिलाओं की आय बढ़ रही है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है। दुधवा का यह बदलता स्वरूप बता रहा है कि अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्र की बेटियां भी नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकती हैं। आज थारू बेटियां सिर्फ अपनी नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की नई पहचान बन रही हैं।
दुधवा गाइड देवकी राना और घूमनी राना। संवाद