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‘कभी-कभी प्याज भी पनीर बन जाता है’

Wed, 14 Oct 2015 10:05 PM IST
लखीमपुर खीरी।
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शहर में मंगलवार की शाम ठहाकों के नाम रही। सुप्रसिद्ध कवि अनल अनल और उमा शंकर मिश्र ने होटल दीप शिखा में ‘हास्य का हंगामा’ अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें चुनिंदा कवियों ने अपनी हास्य व्यंग्य रचनाओं से लोगों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी और समाजसेवी प्रेम शंकर अग्रवाल ने की।
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वाणी वंदना के साथ शुरू हुए कवि सम्मेलन में लॉफ्टर कार्यक्रम के प्रतिभागी प्रताप सिंह फौजदार ने अपनी रचना से लोगों को खूब गुदगुदाया-
आगे-आगे एक नंगा आदमी भागा चला जा रहा था
उसके पीछे एक कच्छा पहनकर चला आ रहा था
मेरे मित्र ने कहा प्रताप सिंह यह क्या क्लेश है, यह कैसा भेष है।
मैने कहा सर आगे वाला विकसित और पीछे वाला विकासशील देश है।
इंदौर से आए अतुल ज्वाला की रचना सुन श्रोता झूम उठे-
ममता को छोड़ वासना के स्पर्श पर आ गए
मर्यादित लोग अश्लीलता के निष्कर्ष पर आ गए।
इतना गिरा दीदा, कविता के मोल को हमारे
चार तालियों के लिए अर्श से फर्श पर आ गए।
मध्य प्रदेश की डॉ. प्रेरणा ठाकरे की रचना ने भी खूब तालियां बटोरीं-
दुनिया में वक्त से बड़ा नहीं कोई सख्त
वक्त ही किसी की तकदीर बन जाता है
वक्त हो बुरा तो कोई ठोकरों पर रहता है
वक्त साथ दे तो वो ही पीर बन जाता है।
कभी-कभी प्याज भी पनीर बन जाता है।
राजेंद्र राजन ने जिंदगी की हकीकत कुछ इस तरह बयां की-
एक चादर फटी हूं, सी ले मुझे, तेरी तिश्नुगी हूं पी ले मुझे
मौत आनी है आ ही जाएगी, जिंदगी हूं कि हंस के जी ले मुझे।
जबलपुर के सुदीप मिश्र ने कहा-
जिन्होंने हंसकर दे दी जान, बढ़ाई भारत मां की शान
तिरंगे का रखा सम्मान, मैं तुझसे पूछूं हिंदुस्तान उन्हें हम क्या दे पाए।
आशीष अनल ने की इस रचना ने खूब वाहवाही लूटी-
प्रश्न था कि वीरता के तीन प्रयाय लिखो
यूं लगा कि बच्चे ने दो अभिज्ञान लिख दिया
तीजा पर्याय जब उसे याद आया नहीं तो उसने वहां पर सिर्फ हिंदुस्तान लिख दिया।
कवि सम्मेलन में उज्जैन के कवि अशोक भाटी, शबीना अदीब, कमलेश धुरंधर और राजेंद्र प्रसाद तिवारी ने भी अपनी रचनाएं सुनाईं। आयोजक उमाशंकर मिश्र ने कवियों को स्मृति चिह्न भेंट कर उन्हें सम्मानित किया।
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