जिंदगी की भागदौड़ और व्यस्तताओं के बीच सावन की मस्ती कहीं गुम हो गई है। शहर तो दूर अब गांवों में भी सावन के मधुर गीत सुनाई नहीं देते। पेड़ों पर पड़े झूले और उनपर पींग बढ़ाती युवतियों वाले दृश्य अब विरासत बनते जा रहे हैं। सावन का महीना प्रकृति की समृद्धि और भक्ति का महीना माना जाता है। हर तरफ फैली हरियाली जीवन में मस्ती भर देती है। लगातार प्रकृति से बढ़ती दूरी के कारण सावन की मस्ती भी इंसानी जिंदगी से दूर होने लगी है।
मौजूदा समय में लोगों की व्यस्तता कुछ इस कदर बढ़ गई है कि त्योहार और उत्सव महज औपचारिकता बन कर रह गए हैं। कब सावन आया, कब भादों निकल गया लोग जान ही नहीं पाते, बढ़ती आबादी और बढ़ते आवासीय भवनों के कारण हरियाली लुप्त होती जा रही है। जिन बड़े पेड़ों की डालों पर सावन में झूले पड़ते थे वे बड़े पेड़ गांवों के आबादी वाले क्षेत्रों से गायब हो गए हैं।
पहले ऐसे मस्ती लेकर आता था सावन
आज से 30-40 साल पहले तक सावन आने से पहले ही लोग तैयारियों में जुट जाते थे। झूले के लिए मूंज की मोटी रस्सियां तैयार की जाती थीं। सावन शुरू होते ही नीम, पाकड़ और बरगद जैसे बड़े पेड़ों पर झूले पड़ जाते थे। हर तरफ फैली हरियाली के बीच गांव की लड़कियां और मायके आने वाली नवविवाहिताएं जब मीठे स्वरों में सावन गीत गाते हुए झूले पर पींगे बढ़ाती थीं तो पूरा वातावरण झूम उठता था।
आज सावन का है यह रूप
मौजूदा समय में हरियाली कम होने के साथ ही लोगों की सामुदायिक भावना में भी कमी आई है। आज शहरों में तो क्या ग्रामीण इलाकों में भी झूले नहीं दिखते। महिला संगठन और महिला क्लब सावन महोत्सव, तीज महोत्सव आदि करके सावन की परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।
सोशल साइट्स पर छाया सावन
असल जिंदगी में सावन का महत्व भले ही कम हुआ हो लेकिन सोशल साइट्स जैसे व्हाट्स एप और फेसबुक पर सावन की मस्ती बरकरार है। इनके जरिए लोग हरियाली झूलों और मेंहदी रचे हाथों की तस्वीरें डालकर लोगों को सावन की याद दिला रहे हैं। सावन पर रचे पुरानी गीतों की भी याद ताजा की जा रही है।