अंतरराष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी के समापन सत्र में संस्कृत भाषा के सम्यक विकास के लिए इसे रोजगार से जोड़ने पर बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत भाषा विश्व की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक भाषा है। इसे आधुनिक बनाने के लिए आधुनिक विषयों से जोड़ा जाना जरूरी है। वक्ताओं ने संस्कृत में निहित विज्ञान की विरासत के उपयोग के लिए वैज्ञानिकों और संस्कृत विद्वानों के बीच समन्वय की जरूरत बताई।
उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और भगवानदीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में ‘संस्कृत वांगमय में चिंतन के विविध आयाम’ विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय विचार संगोष्ठी का रविवार को समापन हो गया। समापन समारोह की अध्यक्षता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अशोक कुमार कालिया ने की। उन्होंने अन्य अतिथियों के साथ दीप प्रज्जवलित कर और छात्राओं ने मां सरस्वती की वंदना प्रस्तुत कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। प्राचार्य डॉ. निरुपमा अशोक ने मौजूद अतिथियों का परिचय दिया।
विशिष्ट अतिथि बद्री विशाल महाविद्यालय फर्रुखाबाद के पूर्व प्राचार्य डॉ. शिव बालक द्विवेदी ने कहा कि संस्कृत एक समृद्ध भाषा है, यह विश्व की भाषाओं की जननी है। उन्होंने इसके अथाह शब्द संपदा का व्यापक अध्ययन, अध्यापन और भाषा शास्त्रीय अनुशीलन की महती आवश्यकता पर बल दिया। बौद्ध अध्ययन एवं संस्कृत विभाग, संस्कृत विश्वविद्यालय काठमांडू के प्रो. प्रेमराज न्यौपाने ने सभी से संस्कृत के प्रति सम्मान और गर्व का भाव रखने तथा इसके प्रचार-प्रसार पर बल दिया।
कार्यक्रम संयोजिका डॉ. पुष्पा मलिक ने बताया कि दो दिवसीय संगोष्ठी कई सत्रों में हुई। इसमें 200 से अधिक शोधार्थियों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के दौरान शोधार्थियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। जिले में पहली बार बड़े पैमाने पर हुई इस वृहद् अंतरारष्ट्रीय संस्कृत संगोष्ठी अपनी अलग छाप छोड़ गई।
संस्कृत बहुआयामी चिंतन का वांगमय
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रो. अशोक कालिया ने कहा कि मौजूदा समय में संस्कृत को कर्मकांड की भाषा साबित कर इसकी उपेक्षा की जा रही है, जो गलत है। संस्कृत बहुआयामी चिंतन का वांगमय है। उन्होंने विस्तार से विद्या के 14 स्थान जो धर्म स्थान भी है तथा चार प्रमुख विद्या स्थान और स्फुट विषयों का उल्लेख करते हुए संस्कृत के विविध आयामों की व्याख्या की। साथ ही संस्कृत साहित्य के विकास के लिए सरलीकरण की वकालत की।
पुराने ग्रंथों को प्रासंगिक अनुसंधान से जोड़ें
संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ओम प्रकाश पांडेय ने कहा कि संस्कृत अध्येताओं को विषयों का पिष्टपेषण करने से बचना चाहिए। पुराने उपेक्षित ग्रंथों पर नवीन दृष्टि सहित प्रासंगिक विषयों को अनुसंधान से जोड़कर अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृत पढ़े बिना समाजशास्त्र, मानव विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति आदि का समग्र अध्ययन असंभव है।
वेदों से जीवन की गुत्थियां सुलझा सकते हैं
नारी शिक्षा निकेतन के मानव शास्त्र विभाग की डॉ. विभा अग्निहोत्री ने कहा कि मनुष्य की शारीरिक सामाजिक, तात्विक और मानव शास्त्रीय अध्ययन प्रकृति का स्त्रोत है। संस्कृत साहित्य और वेदों के अनुशीलन से हम अपने जीवन की तमाम गुत्थियों को सुलझा सकते हैं। उन्होंने कहा कि सब कुछ पढ़िए लेकिन संस्कृत जरूर पढ़िए। संस्कृत जाने बिना अमूल्य ज्योतिष विद्या, आयुर्वेद, नीति और धर्म को जानना असंभव है।
--
संगोष्ठी में यह रहे मौजूद
संगोष्ठी में नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय काठमांडू (नेपाल) के बौद्ध अध्ययन और संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. काशीनाथ न्यौपाने, प्रो. अशोक अवस्थी, डॉ. कामिनी महेंद्रा, डॉ. केके श्रीवास्तव, डॉ. श्रीराम सिंह, डॉ. एससी मिश्र, कृष्णा चौहान, राजकुमार त्रिवेदी, प्रबंध समिति के सचिव शिवचंद्र सिंह, डॉ. सुरचना त्रिवेदी, डॉ. गीता शुक्ला, गुरमीत कल्सी आदि मौजूद रहे।