बांकेगंज। पितृपक्ष शनिवार से शुरू हो गए हैं। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक मनाए जाने वाले पितृपक्ष का समापन 10 अक्तूबर को होगा। ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि मालूम नहीं है या भूल गए हैं, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।
गोला के ज्योतिषाचार्य पं. रामदेव मिश्र शास्त्री के मुताबिक पितृपक्ष में पितृगण सूर्य की किरणों पर सवार होकर धरती पर आते हैं। वे अपने पुत्र, पौत्रादि से अन्न, जल और हव्य ग्रहण कर अमावस्या पर विदा लेते हैं। स्वजनों की तृप्ति के लिए श्रद्धा से किया गया शुभ संकल्प और तर्पण ही श्राद्ध कहलाता है।
धर्मग्रंथों के अनुसार पुरखों की तिथि पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि धन न हो तो पितरों का स्मरण कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आंसू बहाने से भी पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है। वे केवल श्रद्धा और भाव के भूखे होते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार पितृ पूजन से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, बल, वैभव, सुख, धन और धान्य देते हैं।