लखीमपुर खीरी। कुपोषण से जंग में जिला अस्पताल का पोषण पुनर्वास वार्ड संजीवनी साबित हो रहा है। यहां आने वाले बच्चों को न केवल पौष्टिक आहार दिया जा रहा है, बल्कि माताओं को भी सही खानपान और देखभाल के बारे में प्रशिक्षित किया जा रहा है। इससे कई गंभीर स्थिति वाले बच्चे अब पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं।
जिला अस्पताल में 10 बेड के बने पोषण पुनर्वास वार्ड में इस समय सात बच्चे भर्ती हैं। हर महीने औसतन 20 से 25 बच्चे इस वार्ड में भर्ती होते हैं। इस माह में भी 20 दिन के अंदर अब तक करीब 13 बच्चे भर्ती हो चुके हैं।
चिकित्सकों के अनुसार, यहां बच्चों को दूध, खिचड़ी, दलिया, हरी सब्जियां और मौसमी फल दिए जाते हैं। भोजन की मात्रा और समय का निर्धारण उनके वजन और स्थिति के आधार पर किया जाता है। इसके साथ ही माताओं को भी सिखाया जाता है कि घर लौटने के बाद किस तरह बच्चों को पौष्टिक आहार देना है। संवाद
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केस 1
वार्ड में भर्ती दो माह की लक्ष्मी का वजन मात्र 1.5 किलो था। बुखार और कमजोरी के कारण उसकी हालत खराब थी। पोषण पुनर्वास वार्ड में दो सप्ताह तक इलाज और संतुलित भोजन मिलने के बाद उसका वजन बढ़कर दो किलो हुआ और वह स्वस्थ हो गई।
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केस 2
तीन माह की इकरा का भी हाल लक्ष्मी जैसा था। वह भी वार्ड में भर्ती होने से पहले काफी कमजोर थी। उसका वजन 2.100 किलो था। वार्ड में उसकी देखभाल करने के साथ पौष्टिक आहार दिया गया। 14 दिन में ही इकरा का करीब एक किलो वजन बढ़ गया।
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मां को प्रतिदिन मिलते हैं 50 रुपये
वार्ड में भर्ती बच्चों की माताओं को प्रतिदिन 50 रुपये के हिसाब से 14 दिन की राशि उनके खाते में भेजी जाती है। उन्हें नियमित रूप से जागरूक किया जा रहा है। उन्हें बताया जाता है कि बच्चों के भोजन में प्रोटीन, विटामिन और आयरन युक्त आहार अनिवार्य है। साफ-सफाई और स्तनपान के महत्व पर भी जोर दिया जाता है।
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टीवी, झूले और खिलौनों की है व्यवस्था
पोषण पुनर्वास में भर्ती बच्चों को घर जैसा वातावरण मिले, इसके लिए जिला अस्पताल के इस वार्ड में टीवी लगाई गई है। बच्चों के खेलने-कूदने के लिए झूले भी लगे हैं। साइकिल के साथ ही वार्ड में ही एक प्ले ग्राउंड भी बनाया गया है।
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बीमारी से बचाव के उपाय
-जन्म के छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध दें। बच्चों के आहार में दाल, दूध, हरी सब्जियां और फल नियमित शामिल करें। साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें व गंदगी में पनपने वाले संक्रमण से बचाएं। बच्चों को जंक फूड और पैकेट वाले खाद्य पदार्थ कम दें। समय-समय पर उनका वजन और स्वास्थ्य की जांच जरूर कराएं।
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कुपोषण से लड़ाई केवल अस्पताल में ही नहीं, बल्कि घर-घर में लड़ी जानी चाहिए। यदि समय रहते बच्चों को संतुलित भोजन मिले तो वे कभी कुपोषण का शिकार नहीं होंगे। पोषण पुनर्वास वार्ड की यह पहल अब जिले के हजारों बच्चों के लिए नई उम्मीद बनकर उभर रही है।
डॉ. आरपी वर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल