मलेरिया विभाग लार्वा को मच्छर बनने तक पालेगा फिर करेगा पहचान
अलग से बनाया गया मॉस्क्यूटो नेट
जगह जगह से इकट्ठा होगा लार्वा
ग्लूकोज के सहारे रखा जाएगा जिंदा
जिले में कितने प्रकार के मच्छर हैं। वे कौन कौन-सी बीमारी फैलाने वाले हैं। इसकी पहचान के लिए जिला मलेरिया ऑफिस में मच्छरों के लिए मॉस्क्यूटो नेट तैयार किया गया है। मलेरिया विभाग की टीम लार्वा खोजी अभियान के दौरान विभिन्न जगहों से लाए गए लार्वा को इसमें रखेगी और मच्छर बनने के बाद उनका परीक्षण करेगी।
मच्छर जनित बीमारियों की रोकथाम के लिए मलेरिया विभाग की टीम ने सरकारी कार्यालयों सहित लोगों के घरों से लार्वा इकट्ठा करना शुरू किया है। इकट्ठा किए लार्वा पालन के दौरान उन्हें ग्लूकोज मिले पानी में रखा जाता है। सात दिन में लार्वा से बने मच्छरों को जीवित रखने के लिए नेट में ग्लूकोज से भीगी हुई रूई रखी जाती है, जिससे मच्छर उससे ग्लूूकोज का सेवन करके जिंदा रह सके। इसके बाद मच्छरों को परखनली में लेकर माइक्रोस्कोप से उसकी पहचान की जाती है कि जिले में किस प्रजाति के मच्छरों की नर्सरी कहां पर तैयार हो रही है।
लखनऊ में टीम को दी गई ट्रेनिंग
डीएमओ ने बताया कि लार्वा से मच्छर बनने तक उसकी देखरेख करने और उसको जीवित रखने के लिए ग्लूकोज आदि देने की ट्रेनिंग सत्यप्रकाश मिश्रा और सुरेश कुमार को दी गई है। यही लोग लार्वा को सुरक्षित लाकर उसे मॉस्क्यूटो नेट में रखकर उसकी देखरेख करते हैं।
जिले में मच्छरों की प्रजाति रोग
1-एनॉफ्लीस मादा मलेरिया
2-क्यूलेक्स फाइलेरिया
3-एडीज एजिप्टाई डेंगू, चिकनगुनिया
4-विश्रोई जापानी इंसेफ्लाइटिस
मलेरिया ऑफिस में मच्छरों के लिए मॉस्क्यूटो नेट बनाया गया है, जिसमें निरीक्षण के दौरान विभिन्न जगहों से इकठ्ठा किए गए लार्वा रखे जाते हैं, जिससे इनके मच्छर बनने पर पहचान हो सके कि जिले में कितनी प्रजाति के मच्छर हैं।
डॉ. एसके वर्मा, जिला मलेरिया अधिकारी