लखीमपुर खीरी। अचार, मुरब्बा सहित कई महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ तैयार करने का प्रशिक्षण देने और लोगों को रोजगार से जोड़ने वाला फल संरक्षण विभाग आज अनदेखी की भेंट चढ़ गया। विभाग के पास न तो योजनाएं हैं न ही स्टाफ। धीरे-धीरे इसका वजूद खत्म होता नजर आ रहा है।
फल संरक्षण कार्यालय पहले सदर तहसील के सामने था। उस दौरान चार से पांच योजनाएं संचालित थीं। विभाग में ही बड़ी मात्रा में अचार, मुरब्बा सहित अन्य खाद्य पदार्थों का प्रशिक्षण दिया जाता था। साथ ही शहर के काफी लोग वहां से अचार-मुरब्बा सहित अन्य खाद्य पदार्थ तैयार कराते थे, जिसका शुल्क लगता था। इससे विभाग की आय भी होती थीं और लोगों को शुद्ध और गुणवत्तापूर्ण खाद्य पदार्थ मिलता था।
उस दौरान विभाग से 14 दिन का ढाबा, होटल का प्रशिक्षण दिया जाता था। प्रचार-प्रसार के लिए पहले डॉस्प योजना चलती थी। विभाग की योजनाएं लोगों को बताई जाती थीं। साथ ही 100 दिवसीय खाद्य एवं उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया जाता था, आदि काफी कुछ था। उस दौरान टमाटर का सूप बनता था, जिसकी काफी डिमांड रहती थी, लेकिन अब कुछ भी नहीं बचा। संवाद
सात की जगह मात्र दो का बचा स्टाफ
फल संरक्ष्ण विभाग में प्रभारी सहित सात का स्टाफ होना चाहिए, लेकिन मौजूदा समय में मात्र दो से काम चलाया जा रहा है। स्टाफ में एक केंद्र प्रभारी, एक सहायक प्रभारी, दो पर्यवेक्षक, तीन परिचर के पद हैं। इसमें एक सहायक प्रभारी और एक परिचर है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब जहां कार्यालय है, वहां तक पहुंचना लोगों के लिए बड़ी चुनौती बनी है।
विभाग का स्थान बदलने कम हो गया वजूद
फल संरक्षण विभाग पहले सदर तहसील के सामने था, लेकिन वर्ष 2011 में यह दउवापुर गांव में स्थित जिला उद्यान विभाग में भेज दिया गया। जब से यह विभाग वहां पहुंचा है, तब से अधिकांश लोगों को वहां जाने का रास्ता नहीं पता है। यही वजह है कि धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता खत्म होती जा रही है।
-
गोला और मोहम्मदी में भी चलती थी इकाई
जिला मुख्यालय के साथ फल सरंक्षण की इकाई पहले गोला और मोहम्मदी में भी संचालित थी। क्षेत्र के लोगों को उसका पूरा लाभ मिलता था। कुछ साल बाद गोला और मोहम्मदी की इकाई बंद कर दी गई। वहां की इकाई बंद होने पर लोगों को जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ती है।
विभाग में स्टाफ बढ़ाने के लिए कई बार शासन को पत्र लिखा है। कम स्टाफ में काम करने में दिक्कत हो आती है, लेकिन फिर भी बेहतर काम करने का प्रयास रहता है।
-राजेश कुमार पिप्पल, सहायक प्रभारी, फल संरक्षण विभाग