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Dudhwa National Park: नेपाली हाथियों को रास आ रही दुधवा की आबोहवा, सीमा पार से आए 200 से अधिक 'गजराज'

Fri, 19 May 2023 04:08 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी

सार

दुधवा टाइगर रिजर्व की वानस्पतिक संरचना नेपाल के जंगलों जैसी ही है। इसके चलते यहां की आबोहवा नेपाल के हाथियों को ज्यादा रास आती है। हाल ही में दो झुंडों में करीब सौ हाथी यहां पहुंचे हैं। 
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दुधवा टाईगर रिजर्व में विचरण करते जंगली हाथी
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विस्तार
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नेपाल के जंगली हाथियों को दुधवा टाइगर रिजर्व जंगल की आबोहवा काफी रास आ रही है। यही कारण है कि हर साल हाथियों के झुंड नेपाल से चलकर दुधवा टाइगर रिजर्व में प्रवास के लिए आते हैं। यहां कुछ दिन या कुछ महीने रहने के बाद वापस नेपाल चले जाते हैं। कभी-कभी इन मेहमान हाथियों को यहां की मेहमान नवाजी ऐसी भाती है कि वे वापस जाने के बजाय स्थायी रूप से यहीं बस जाते हैं।

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इन दिनों नेपाल के शुक्लाफांटा नेशनल पार्क के दो झुंडों में आए करीब सौ हाथी दुधवा नेशनल पार्क में डेरा डाले हैं। इससे पहले नेपाल से आए हाथियों के दो झुंडों में शामिल करीब 80 हाथियों ने किशनपुर सेंक्चुरी, बफर जोन की मैलानी रेंज और दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज में कई महीनों तक डेरा डाल रखा था।

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दुधवा टाइगर रिजर्व की वानस्पतिक संरचना नेपाल के जंगलों जैसी ही है। इसके चलते यहां की आबोहवा नेपाल के हाथियों को ज्यादा रास आती है। हाल के कुछ वर्षों में नेपाल में तेजी से जंगलों का कटान हुआ है। इससे हाथियों के प्राकृतवास और भोजन दोनों में कमी आई है। नेपाल से जंगली हाथी नदियों का जलस्तर कम होने के बाद तराई के जंगलों में आते हैं। इनके आने का समय मई से सितंबर तक है। 

नेपाल में हर साल आने वाली बाढ़ से भी नेपाल के जंगली हाथी पलायन को मजबूर होते हैं। दरअसल, नेपाल की नदियों में हर साल आने वाली बाढ़ के चलते बारिश के मौसम में जंगल के अंदर पानी भर जाता है। जिससे जंगली हाथियों के लिए आवास का संकट पैदा हो जाता है।

नेपाल से हाथियों के आने के हैं कई कॉरिडोर

दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर बी. प्रभाकर बताते हैं कि हाथियों में जेनेटिक मेमोरी होती है। इसके कारण हाथी उन्हीं रास्तों से आवागमन करते हैं और वहीं जाते हैं, जिन रास्तों से और जहां उनके पुरखे आते-जाते रहे हैं। तराई के जंगल में हाथियों के आने के कई कॉरिडोर हैं। 
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इनमें से एक कॉरिडोर नेपाल के शुक्लाफांटा से घनाराघाट, टाटरगंज, ट्रांस शारदा क्षेत्र होते हुए पीलीभीत टाइगर रिजर्व के हरीपुर रेंज तक है। जंगली हाथी यहां से किशनपुर सेंक्चुरी की ओर रुख करते हैं। इनके अलावा हाथियों के और भी कई कॉरिडोर हैं, जिनका इस्तेमाल हाथी दुधवा के सठियाना रेंज, कतर्निया घाट और महराजगंज के सोहागी बरुआ आने में करते हैं।

हाथी किसानों के लिए बनते हैं मुसीबत

नेपाल से आने वाले जंगली हाथी तराई में आकर दिन भर तो जंगल में आराम करते हैँ और रात में सैर करने के लिए खेतों की ओर निकल जाते हैं। खेतों में पहुंचकर जंगली हाथी फसलों को रौंद कर तबाह कर डालते हैं। पिछले साल अगस्त में आए हाथियों के दो झुंडों ने जंगल के आसपास काफी उत्पात मचाया था। लाखों रुपये मूल्य की फसलों को नष्ट कर दिया था। आज तक इन किसानों को मुआवजा भी नहीं मिल पाया है।
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