विधान परिषद चुनाव में भाजपा के घोषित प्रत्याशी नरेशचंद्र वर्मा ने नामांकन की आखिरी तारीख से ठीक एक दिन पहले चुनाव मैदान छोड़ दिया। इससे जहां राजनीतिक हल्कों में चर्चाओं का बाजार गर्म है वहीं भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। नरेशचंद्र वर्मा के इस निर्णय से भाजपा कार्यकर्ता सकते में हैं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेशचंद्र वर्मा का नामांकन 15 फरवरी को होना था लेकिन उन्होंने नामांकन के लिए निर्धारित अंतिम तिथि से एक दिन पहले ही रविवार को चुनाव मैदान से हटने का एलान करके सभी को चौंका दिया। नरेशचंद्र वर्मा ने अपनी उम्मीदवारी छोड़ने का कारण पार्टी से आर्थिक मदद न मिलना बताया है। नरेशचंद्र वर्मा ने बताया कि चुनाव में लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का खर्च आता। पार्टी चुनाव के लिए कोई धनराशि नहीं दे रही है ऐसे में वह चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। रविवार को उन्हें पार्टी के लिए सिंबल लेने लखनऊ जाना था। जब पार्टी की तरफ से पूछा गया कि वह सिंबल लेने नहीं आए तो उन्होंने पार्टी नेताओं को स्पष्ट कर दिया कि पार्टी रुपये नहीं देगी तो वह चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।
1977 से 1980 तक विधायक रहे नरेश चंद्र वर्मा
नरेशचंद्र वर्मा वरिष्ठ अधिवक्ता और भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। 1977 से 1980 तक वह जनता पार्टी से विधायक भी रहे। स्थापना के समय ही भाजपा में आ गए। वर्ष 1993 से 1996 तक वह भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष भी रहे। 1998 से 2005 तक वह जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन रहे।
पार्टी से बगावत भी कर चुके हैं नरेशचंद्र
वर्ष 1999 में पार्टी से एमएलसी का टिकट न मिलने पर नरेशचंद्र वर्मा ने पार्टी से बगावत कर दी थी और पार्टी प्रत्याशी के विरोध में वह निर्दलीय चुनाव लड़े थे। नरेशचंद्र वर्मा ने बताया कि वर्ष 1999 में सपा ने निदेश सिंह को प्रत्याशी बनाया था। मांगने पर भी पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय लड़ा लेकिन सपा प्रत्याशी से 20 वोटों से चुनाव हार गया। इसके बाद फिर भाजपा में आ गया। पार्टी ने उस समय इंद्रपाल वर्मा को प्रत्याशी बनाया था।
नरेश चंद्र वर्मा का यह कदम पार्टी को हैरान करने वाला है। इससे पार्टी की साख पर असर पड़ेगा। जहां तक पार्टी से चुनाव के लिए धन न मिलने का ‘बहाना’ है तो इस बारे में उन्हें पहले ही बता दिया गया था कि चुनाव के लिए पार्टी कोई पैसा नहीं देगी। फिलहाल पार्टी पूरी स्थिति पर विचार विमर्श करने के बाद कोई निर्णय लेगी। प्रदेश नेतृत्व यदि कोई उम्मीदवार तय करता है तो 15 को नामांकन कराया जाएगा।
- शरद वाजपेयी, जिलाध्यक्ष, भाजपा।
नामांकन का आखिरी दिन, विपक्ष लाचार
लखीमपुर खीरी। एक तरफ विधान परिषद चुनाव के लिए रणभूमि तैयार है और इस रणभूमि में योद्धा के रूप में सपा से शशांक यादव ही अब तक अकेले अपनी तलवार भांजते नजर आ रहे हैं। विपक्ष ने लगभग उनका मैदान साफ कर दिया है। सोमवार को एमएलसी पद के लिए नामांकन का आखिरी दिन है और भाजपा के घोषित प्रत्याशी नरेश चंद्र वर्मा ने बिना लड़े ही चुनाव मैदान छोड़ दिया है। बसपा और कांग्रेस ने इस चुनाव में अपना प्रत्याशी ही नहीं उतारा है। ऐसे में राजनीतिक गलियारे में सभी की निगाहें नामांकन के आखिर दिन भाजपा के अगले कदम पर टिक गई है।
बता दें कि एमएलसी पद के लिए आठ से 15 फरवरी तक नामांकन की तिथि निर्धारित की गई है। 16 फरवरी को नामांकन पत्रों की जांच और 18 फरवरी को नाम वापसी की तिथि है। सपा प्रत्याशी शशांक यादव बीते 11 फरवरी को अपना नामांकन करा चुके हैं। भाजपा ने एमएलसी पद के चुनाव में पूर्व विधायक नरेश चंद वर्मा को अपना प्रत्याशी घोषित किया था और कहा गया था कि वह पार्टी नेताओं के साथ सोमवार को अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगे। इसके लिए रविवार को भाजपा कार्यालय पर जिलाध्यक्ष शरद वाजपेयी की अगुवाई में पार्टी नेताओं की महत्वपूर्ण बैठक भी होने वाली थी, लेकिन बैठक से पूर्व ही एक नाटकीय घटनाक्रम में भाजपा के घोषित प्रत्याशी नरेश चंद वर्मा ने एमएलसी पद का चुनाव लड़ने से मना कर दिया है। ऐन मौके पर घोषित प्रत्याशी के बदले तेवर से भाजपा कार्यकारिणी सन्न रह गए हैं। अब देखना ये है कि सोमवार यानि नामांकन के आखिरी दिन भाजपा एमएलसी पद के चुनाव को लेकर क्या रणनीति तय करती है।