पसगवां। कुछ वर्ष पूर्व तक नवंबर-दिसंबर में प्रवासी पक्षियों से सई नदी का उद्गम स्थल जीवंत हो जाता था। पिनटेल डक, ब्लैक नेक्ड स्ट्रोक, ग्रेलेज गूज, ओपनबिल्ड, स्पून विल स्टार्क, पेंटेड बगुला आदि पक्षी यहां कलरव करते थे लेकिन इस बार यह स्थान सूना है।
पर्यावरणविद् हरेंद्र वर्मा का कहना है कि जब से सई नदी के उद्गम स्थल की डीसीएम फाउंडेशन ने जेसीबी से खोदाई कराई और सिंघाड़े की फसलें उगाईं, तब से यह स्थल प्रवासी पक्षियों के लिए बेगाना हो गया। खोदाई होने से पूरे वेटलैंड की जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र क्षीण हो गया।
प्रवासी पक्षियों का न आना पर्यावरण और प्रकृति प्रेमियों के लिए बहुत निराशाजनक संकेत है। ग्रामीणों का आरोप है कि सई नदी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ड्रीम प्रोजेक्ट है। इसके बाद भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई। ग्रामीणों का कहना है कि इस स्थल को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए। इससे प्रवासी पक्षी पुनः इस स्थल की ओर आकर्षित होंगे।
यह स्थान सारस पक्षी का भी बहुत बड़ा हैबीटेट रहा है, किंतु जल व भोजन की कमी व अतिक्रमण की वजह से दो-चार सारस और बगुले ही दिखाई देते हैं। सई नदी गोमती नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। सई नदी की छोटी-बड़ी 554 सहायक नदियां हैं। सई नदी 715 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद जौनपुर के राजघाट पर गोमती नदी में मिल जाती है। इससे पहले यह नदी भैंसटा नदी के नाम से जानी जाती है।