जिले का दक्षिण खीरी वन प्रभाग जैव विविधता से हमेशा समृद्धा रहा है। दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर सेंक्च्युरी के बाद सबसे ज्यादा दुर्लभ वन्यजीवों की संख्या मैलानी और भीरा के जंगलों में है। इधर पिछले करीब पांच वर्षों से इन हरे-भरे और घने जंगलों में भालुओं की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
2009 में वन्यजीवों की गणना में यहां करीब सात भालू पाए गए थे। 2012 में संख्या बढ़कर दस के करीब पहुंच गई। वहीं 2012 के बाद इनकी संख्या में और इजाफा हुआ है। जंगल के बाहरी किनारेेे पर यह भालू चहलकदमी करते अक्सर दिखाई पड़ जाते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ और राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ वीपी सिंह की मानें तो जिले भर के जंगलों जिनमें दुधवा नेशनल पार्क ओर किशनपुर सेंक्च्युरी भी शामिल हैं में 2009 की गणना में भालुओं की संख्या 60 मिली, जो वर्ष 2012 में बढ़कर 95 को पार कर गई, उनके मुुताबिक इस समय संख्या 100 से अधिक होने की सभावना है। उनका यह भी मानना है कि दक्षिण खीरी वन प्रभाग के भीरा और मैलानी रेंज में भी इनकी संख्या में इजाफा हुआ है। क्योंकि यह जंगल भालुओं के लिए अनुकूल प्राकृतिक आवास माने जाते हैं।
भालू आमतौर पर ठंडे क्षेत्र में रहना पसंद करते है, लेकिन हिमालय की तलहटी में स्थित यह जंगल भालुओं के लिए हमेशा पसंदीदा जगह रहे हैं। यही कारण है कि यहां दूसरे जानवरों के साथ-साथ भालुओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। इन दिनों जंगलों में मधुमक्खियों ने शहद के जो छत्ते लगाए है उन्हें ये भालू बड़े चाव से खा रहे हैं। इसके अलावा जंगलों में मिट्टियों के लगे ढेर में मिलने वाली दीमक भी उनका पसंदीदा भोजन है। उधर डीएफओ साउथ नीरज कुुमार का कहना है कि मैलानी ओर भीरा रेंज में भालुओं की संख्या 10 से अधिक है।
भालू ने वॉचर पर हमला कर किया था घायल
जून 2015 में मैलानी रेंज से सटे किशनपुर सेंक्च्युुरी की मड़हा बीट में गश्त कर रहे कुकरा निवासी वॉचर पुत्तूलाल को भालू ने हमला कर घायल कर दिया था। वनकर्मियों को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने वॉचर का इलाज कराया।