लखीमपुर खीरी। देवकली के सैदापुर झाउ स्थित मेडिकल कॉलेज में कैडेवर (शव) की किल्लत है। चिकित्सा शिक्षा में कैडेवर का उपयोग शरीर रचना (एनाटॉमी) और शल्य तकनीक सीखने के लिए किया जाता है। बिना वास्तविक शरीर के अभ्यास के विद्यार्थियों का अनुभव अधूरा रह जाता है। भविष्य में चिकित्सकीय कौशल प्रभावित हो सकता है।
मेडिकल कॉलेज के पहले सत्र में एमबीबीएस की 100 सीटें हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के मानक के अनुसार, मेडिकल काॅलेजों में छात्रों के अध्ययन के लिए प्रति 10 छात्र पर एक मानव शव होना चाहिए, लेकिन जिले के कॉलेज में महज छह शव ही मौजूद हैं। विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी इसका असर हो रहा है।
कॉलेज प्रशासन ने बताया कि कैडेवर की कमी का मुख्य कारण देहदान में कमी है। उन्होंने कहा कि स्थानीय अस्पतालों और दानदाताओं के साथ संपर्क बढ़ाकर जल्द ही पर्याप्त कैडेवर उपलब्ध कराने की योजना बनाई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कैडेवर से ही छात्र शरीर की संरचना, रोग पहचान और सर्जिकल कौशल सीख पाते हैं। बिना इसके अनुभव के केवल थ्योरी पढ़ना भविष्य के डॉक्टरों की दक्षता प्रभावित कर सकता है।
यह शव दान के लिए नहीं किए जाते हैं स्वीकार
-क्षय रोग (टीबी) से संक्रमित व्यक्ति का शव। कैंसर संक्रमित। एचआईवी (एड्स) संक्रमित। हेपेटाइटिस बी या सी से संक्रमित। किसी गंभीर संक्रमण से संक्रमित। शव परीक्षण या पोस्टमॉर्टम के बाद का शरीर।
यह कर सकते हैं देह दान
-ब्रेन डेड व्यक्ति का दिल मशीनों की मदद से धड़कता रहता है, जिससे अंगों में रक्त संचार बना रहता है। कार्डियक डेड डोनर। प्राकृतिक रूप से हुई मौत।
अन्य जिलों से कैडेवर मंगवाए गए हैं। जिले में भी लोगों को देहदान के लिए जागरूक किया जा रहा है। बाकी बच्चों के तीन बैच बनाए गए हैं। इससे सभी बच्चे कैडेवर पर पढ़ाई करते हैं।
-डॉ. वाणी गुप्ता, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज