अटक-अटक कर चल रही मनरेगा की गाड़ी एक बार फिर बजट के टोटे में फंस गई है। छह फरवरी 2015 से भुगतान (एफटीओ) नहीं हो पा रहा है, जिससे 9.73 करोड़ रुपये बकाया हो चुका है। इसमें सबसे ज्यादा मजदूरी बकाया है। वहीं वित्तीय वर्ष समाप्ति की ओर अग्रसर है लेकिन वार्षिक लेबर बजट के सापेक्ष अभी करीब 60 फीसदी धनराशि व्यय की जा सकी है।
बता दें कि वित्तीय वर्ष 2014-15 में जिले का वार्षिक लेबर बजट 119.14 करोड़ रुपये तय है। इसके सापेक्ष अभी तक 65.07 करोड़ के कार्य कराए गए हैं जबकि वित्तीय वर्ष की समाप्ति में सिर्फ डेढ़ माह शेष बचा है। ऐसे में लक्ष्य पूरा होना संभव नहीं प्रतीत हो रहा है। उधर मजदूरों को भुगतान के लाले पड़ गए हैं। छह फरवरी 2015 से फंड ट्रांसफर आर्डर पास नहीं हो रहे हैं, जिससे सभी 15 ब्लाकों और लाइन विभागों पर मजदूरों और सामग्री का 9.73 करोड़ रुपये बकाया हो गया है। स्थिति पर गौर करें, तो अभी तक 55.34 करोड़ का भुगतान हुआ है, इसमें अकुशल श्रमिकों की मजदूरी के लिए 40.78 करोड़ और अर्द्धकुशल श्रमिकों की मजदूरी पर 45.21 लाख रुपये का भुगतान किया गया। वहीं सामग्री पर 11.77 करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं। इसी तरह मनरेगा के अवशेष (बकाया) 9.73 करोड़ में अकुशल श्रमिकों की मजदूरी 5.18 करोड़ और अर्द्धकुशल श्रमिकों की मजदूरी 19.40 लाख रुपये शामिल है, जबकि सामग्री मद का 4.35 करोड़ बकाया है। बकाया भुगतान की कब तक होगा, इसका जवाब अधिकारियों के पास नहीं है।
उपायुक्त श्रम रोजगार प्रवीण कुमार राय ने बताया कि केंद्र सरकार से बजट नहीं मिल पाया है। अवशेष भुगतान की फीडिंग कराई जा रही है, जैसे ही बजट मिलेगा तुरंत भुगतान कराया जाएगा।