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गैंडों के बाद अब तराई में जल भैंसों के पुनर्वासन पर मंथन

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बांकेगंज। तराई के जंगलों में गैंडों की तरह कभी जल भैंसों (वाटर बफेलो) का बसेरा हुआ करता था। यह कब और कैसे लुप्त हुए इसकी खोज की जा रही है, लेकिन शोध के दौरान यह बात सामने आई है कि गैंडों का जो प्राकृतिक वास है। वही प्राकृतिक वास जल भैंसों का भी है। इसी को देखते हुए दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा पुनर्वासन योजना की तरह जल भैंस पुनर्वास योजना शुरू करने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।
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तराई कभी जल भैंस और गैंडों का सुरक्षित और अनुकूल प्राकृतिक वास हुआ करता था, लेकिन 125 साल पहले यहां से गैंडे लुप्त हुए, इससे पहले जल भैंस की प्रजाति लुप्त हो चुकी थी। 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के साथ ही यहां गैंडा पुनर्वासन योजना के प्रयास शुरू हो गए थे। 1984 में गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू कर दी गई। गैंडा पुनर्वासन योजना की सफलता के बाद अब जल भैंस के पुनर्वासन पर जीव वैज्ञानिकों का ध्यान गया है। अध्ययन में यह पाया गया कि जल भैंस और गैंडों का प्राकृतिक वास लगभग एक है। यह आसाम और पश्चिम बंगाल में पाए जाते हैं।
दुधवा टाइगर रिजर्व के पूर्व फील्ड डाइरेक्टर और मौजूदा समय में उप्र बायोडायवर्सिटी बोर्ड के सचिव एवं मुख्य वन संरक्षक राज्य प्राणी उद्यान प्राधिकरण रमेश कुमार पांडेय ने पिछले साल दुधवा टाइगर रिजर्व में जल भैंस पुनर्वासन योजना शुरू करने के लिए एक प्रस्ताव प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विभागाध्यक्ष) को भेजा था। इस प्रस्ताव पर वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हो गया है। यह पता लगाया जा रहा है कि जल भैंस के आहार के रूप में कौन-कौन घासें डीटीआर में मौजूद हैं और कितनी मात्रा में हैं। इनके लिए अनुकूल वैटलैंड डीटीआर में कहां-कहां है। जल भैंसों के लिए अनुकूल वातावरण और जलवायु के लिए भी अध्ययन किया जा रहा है। वैज्ञानिक यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि ऐसे कौन से कारण रहे जिनकी वजह से तराई की धरती से जल भैंस विलुप्त हुई है। अध्ययन के बाद ही दुधवा में जल भैंसों के पुनर्वासन पर अंतिम निर्णय लिया जा सकेगा।
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शक्ल-सूरत भैंस की, लेकिन जल में है वास
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह ने बताया कि जल भैंस का डीलडौल और शक्ल सूरत आम भैंसों की तरह ही होता है। इसकी सींगें आम भैंस से कुछ बड़ी होती हैं। फर्क इतना है कि जल भैंस अधिकांश समय पानी में गुजारते हैं। यदि इसका दुधवा में पुनर्वासन सफल होता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।
पुराणों के अनुसार जल भैंस से जन्मा था महिषासुर
विभिन्न पुराणों का अध्ययन कर चुके गोला के पंडित रामदेव मिश्र शास्त्री का कहना है कि जल भैंस का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर का पिता असुरों का प्रमुख था जो किसी जल भैंस से प्रेम कर बैठा और इसके संसर्ग से महिषासुर का जन्म हुआ। महिषासुर दो शब्दों से बना है एक महिष यानी भैंस और दूसरा असुर। जिसका वध मां दुर्गा ने किया था, इसलिए मां दुर्गा को महिषासुर मर्दनी भी कहा जाता है। इस पौराणिक कथा से यह बात स्पष्ट है कि कि जल भैंस का अस्तित्व हजारों साल से धरती पर है।
जल भैंस और गैंडों का प्राकृतिक वास एक ही है। कभी तराई में जल भैंस भी बड़ी संख्या में मिलते थे। दुधवा टाइगर रिजर्व में इनके पुनर्वासन का प्रस्ताव उच्चाधिकारियों को भेजा गया है। जिस पर अध्ययन किया जा रहा है। यदि जल भैंस के पुनर्वास की हरी झंडी मिलती है तो डीटीआर के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
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संजय पाठक, फील्ड डाइरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व।
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