लखीमपुर खीरी। थैलीसीमिया आनुवांशिक रोग है। यह जितना घातक है, इसकी जागरूकता के बारे में उतना ही अभाव है। शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिन की होती है, लेकिन थैलीसीमिया के कारण सिर्फ 20 दिन रह जाती है। इसका असर शरीर के हीमोग्लोबीन पर पड़ता है। इसके कम होने से शरीर कमजोर होकर बीमारियों के चपेट में आने लगता है। इसके होने का मुख्य कारण रक्तदोष है। इससे बच्चे अधिक पीड़ित होते हैं। समय पर इलाज न होने से बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है।
जिला अस्पताल से रिटायर्ड बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आईबी त्रिपाठी बताते हैं कि एक स्वस्थ शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या 45 से 50 लाख प्रति घन मिलीलीटर होती है। इनका निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है। इनकी उम्र 120 दिन होती है। मगर, थैलीसीमिया होने पर इनकी आयु 20 दिन ही रह जाती है। इसलिए महीने में एक या फिर दो बार रक्त चढ़वाने की जरूरत पड़ती है। उन्होंने बताया कि बच्चों में थैलीसीमिया के लक्षण जन्म के चार से छह माह में दिखने लगते हैं। पीड़ित बच्चे की त्वचा, नाखून, आंख एवं जीभ पीली होने लगती है। उन्होंने बताया कि यदि मां बाप में से कोई एक इससे पीड़ित है तो उनके बच्चे को भी इसके होने की आशंका रहती है। इसके लिए जरूरी है कि शादी से पहले लड़का, लड़की के खून की जांच कराई जाए।
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थैलीसीमिया से बचने के उपाय
-रक्त परीक्षण कराकर इसकी जानकारी हो सकती है।
- शादी से पहले लड़का, लड़की का रक्त परीक्षण कराना चाहिए।
- नजदीकी रिश्ते में विवाह करने से बचना चाहिए।
- गर्भधारण के चार माह के अंदर भ्रूण का परीक्षण कराएं।
- भ्रूण में थैलीसीमिया के लक्षण मिलने पर डॉक्टर से परामर्श करें।
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जिला अस्पताल में पीड़ित बच्चों को चढ़ा रक्त
अप्रैल- 10, मई-15, जून-सात, जुलाई-11, अगस्त-13, सितंबर-12, अक्तूबर-10, नवंबर-11
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नियमित रक्तदान करने से स्वस्थ रहता है शरीर
लखीमपुर खीरी। रक्त को बनाया नहीं जा सकता है। मगर, लोगों की जान बचाने के लिए रोजाना रक्त की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए जिला अस्पताल में ब्लड बैंक है, लेकिन कोरोना काल के चलते वह भी कंगाल है। ऐसे में ब्लड बैंक को जरूरत है रक्तदाताओं की, जिससे थैलीसीमिया पीड़त बच्चों से लेकर गर्भवती महिलाओं और सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायलों की जान बचाई जा सके। जिले में रक्तदाताओं की संख्या बेहद सीमित है, जबकि खून की जरूरत कभी न कभी हर व्यक्ति को पड़ सकती है। ब्लडबैंक की काउंसलर रति वर्मा बताती हैं कि रक्तदान करने से हर कोई बचता है। जिले में कुछ ऐसे रक्तदाता है, जो लोगों का जीवन बचाने के लिए जरूरत पड़ने पर खून देते हैं।
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रक्तदान बेहद पुनीत कार्य है। इससे शरीर पर कोई अंतर नहीं पड़ता। कई साल से रक्तदान कर रहा हूं। ब्लडबैंक में मोबाइल नंबर व ब्लडग्रुप लिखवा दिया है। फोन आने पर रक्तदान करता हूं। जरूरतमंदों की जान बचाने के लिए युवाओं को रक्तदान करना चाहिए।
-जसपाल सिंह पाली, समाजसेवी
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25 से अधिक बार रक्तदान कर चुका हूं। वैसे तो तीन मास बाद रक्तदान करना चाहिए, लेकिन कई बार बच्चों के लिए दो माह पर ही रक्तदान किया। इससे शरीर पर कोई अंतर नहीं मालूम पड़ा। 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को साल में कम से कम एक बार खून अवश्य दान करना चाहिए।
-सुशांत सिंह, टेक्नीशियन ब्लडबैंक, जिला अस्पताल