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जागरूकता के अभाव में गन्ने की सूखी पत्तियां जला रहे हैं किसान

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लखीमपुर के अरनीखाना गन्ना समिति में रखे पराली प्रबंधन के कृषि यंत्र। संवाद - फोटो : LAKHIMPUR
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लखीमपुर खीरी। पराली जलाने की घटनाओं पर अभी पूरी तरह विराम नहीं लग पाया गया है, बल्कि गन्ना सीजन में पराली जलाने के मामले बढ़ गए हैं। पराली प्रबंधन के लिए गन्ना समितियों, पैक्स समितियों और ग्राम पंचायतों में फार्म मशीनरी बैंक स्थापित करके उनमें मल्चर मशीनें खरीदी गई हैं, जो किसानों को फसल अवशेष का प्रबंधन करने के लिए किराए पर उपलब्ध कराई जाती हैं। अब इसे जागरूकता का अभाव कहें या लापरवाही, जिससे लाखों की कीमत की मल्चर मशीनें शोपीस बनी हुई हैं। इनका प्रयोग करने में किसान अभी काफी पीछे हैं।
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किसान फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत 13 सहकारी गन्ना समिति, 17 साधन सहकारी समिति और 21 ग्राम पंचायतों में फार्म मशीनरी बैंक की स्थापना की गई है, जिसमें पराली प्रबंधन के लिए ट्रैश मल्चर उपलब्ध हैं। इसके प्रयोग से फसल अवशेषों को खेतों में ही खाद के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे उर्वरकों के प्रयोग में कमी आएगी और किसानों को अतिरिक्त आय का विकल्प भी मिलेगा। अरनीखाना सहकारी गन्ना समिति में स्थापित मशीनरी बैंक में ट्रैश मल्चर के दो यंत्र और एमबी प्लाऊ थ्री डिस्क उपलब्ध हैं। इस समिति में हरगांव चीनी मिल, खंभारखेड़ा मिल और ऐरा मिल के करीब 15 हजार किसान सदस्य हैं, जो गन्ना आपूर्ति करते हैं। पराली प्रबंधन के मामले में अभी तक आठ किसानों ने ही मल्चर मशीन किराए पर लेकर पराली प्रबंधन किया है। गन्ना पर्यवेक्षक अनिल कुमार मौर्या ने बताया कि किसानों को पराली प्रबंधन के लिए जागरूक किया जा रहा है और कृषि यंत्रों का किराया भी नाममात्र लिया जा रहा है। उधर, लखीमपुर सहकारी गन्ना समिति का हाल भी कुछ ऐसा ही है। इस समिति में कुल 49 हजार किसान सदस्य हैं, जो चीनी मिलों में गन्ना आपूर्ति करते हैं। पराली प्रबंधन के लिए कृषि यंत्रों का प्रयोग करने वाले किसानों की संख्या सिर्फ सात है। सचिव डॉ राजीव सिंह गंगवार ने बताया कि अभी बनवारीपुर, सेहरूआ और छाउछ के किसानों ने पराली प्रबंधन के लिए कृषि यंत्रों का प्रयोग किया है। समिति के माध्यम से किसानों को पराली प्रबंधन के फायदे बताते हुए जागरूक किया जा रहा है।
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पराली प्रबंधन से ऐसे बनाएं खाद
फसलों के अवशेषों को जलाने से वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण एवं आने वाली पीढ़ी पर बुरा असर पड़ता है और पर्यावरण की क्षति होती है। कृषि यंत्रों के प्रयोग से फसल अवशेषों को मृदा में मिलाकर खाद के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं, जिससे फसलों की उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ एमके विश्वकर्मा बताते हैं कि जैविक विधि से भी फसल अवशेष सड़ाकर खाद बना सकते हैं। उन्होंने बताया कि नैडप कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट और डी-कंपोजर का प्रयोग करके फसल अवशेष को बहुत कम अवधि में सड़ा कर खाद का निर्माण किया जा सकता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ पीके बिसेन ने फसल अवशेष के अध्ययन के आधार पर बताया है कि जिले में गेहूं के फसल अवशेष से 1451 टन नाइट्रोजन, 285 टन फॉस्फोरस और 3936 टन पोटाश प्राप्त किया जा सकता है, जो किसानों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध होगा। उन्होंने किसानों को चेताया है कि मिट्टी में कार्बन की उपलब्धता 0.75 थी, जो घटकर 0.20 तक सिमट गई है, जिसका कुप्रभाव मिट्टी के साथ ही उत्पादन पर भी पड़ रहा है।
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कृषि यंत्रों का यह है किराया
पराली प्रबंधन के लिए किसानों को किराए पर दिए जाने वाले यंत्रों का अलग-अलग रेट निर्धारित है। मल्चर सात फिट का किराया 25 रुपये प्रति घंटा, मल्चर पांच फिट का किराया 23 रुपये प्रति घंटा और एमबी प्लाऊ थ्री डिस्क का किराया 29 रुपये प्रति घंटा है।
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पराली प्रबंधन के लिए किसानों को लगातार जागरूक करने के लिए कर्मचारियों की टीमें लगाई गई हैं। पिछले वर्षों के मुकाबले इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है। गन्ना समितियों में स्थापित मशीनरी बैंक से अब तक 110 किसानों द्वारा 95 हेक्टेयर क्षेत्र में पराली प्रबंधन किया गया है।
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-ब्रजेश कुमार पटेल, जिला गन्ना अधिकारी
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