पंजाबी साहित्य और संस्कृति पर प्रभाव विषयक संगोष्ठी
उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी के तत्वावधान में संत कबीरदास एवं बाबा शेख फरीद का पंजाबी साहित्य एवं संस्कृति पर प्रभाव विषय पर संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी में अकादमी की ओर से पंजाबी भाषा के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा बताई गई।
अमर मिलन गेस्ट हाउस में हुई संगोष्ठी में अकादमी के उपाध्यक्ष हरपाल सिंह जग्गी ने बताया कि गुरुग्रंथ साहिब में समाहित 16 भक्तों में से पांच भक्त कबीरदास, सूरदास, रामानंद, भीखन शाह और रविदास का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ। इन संतों की वाणी का पंजाबी संस्कृति एवं समाज पर गहरा असर हुआ। संगोष्ठी में पंजाबी विद्वान दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ मंजीत सिंह ने बताया बाबा फरीद का 13 वीं शताब्दी में पदार्पण हुआ। उन्होंने सभी धर्मों को एकजुट करते हुए नई संस्कृति का आगाज किया। फिर इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 14वीं शताब्दी में संत कबीरदास ने अधिक गतिशीलता प्रदान की। आगे चलकर 15वीं शताब्दी में इसी धारा को आत्मसात करते हुए सिख धर्म ने अपनी आध्यात्मिक विचाराधारा को मानवतावाद पर केंद्रित किया। इन महान संतों की वाणी को गुरुग्रंथ साहिब में समाहित किया गया। देवेंदर सिंह और उनके सहयोगियों ने कबीर एवं बाबा शेख फरीद की वाणी का गायन किया। कार्यक्रम संयोजक सेवक सिंह अजमानी और हरपाल सिंह का विशेष सहयोग रहा।
पंजाबी सरल शिक्षण कार्यक्रम का हुआ शुभारंभ
पंजाबी अकादमी ने पंजाबी सरल शिक्षण कार्यक्रम के तहत लखीमपुर में सेंटर का शुुुुभारंभ किया। पंजाबी समाज के लोगों ने इस कार्यक्रम की सराहना की। अकादमी के प्रतिनिधि अरविंद नारायण मिश्र भी मौजूद रहे।