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फायर अलर्ट सिस्टम भी आग से नहीं बचा पा रहा जंगल

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बांकेगंज। गर्मियों का मौसम शुरू होते ही जंगल में आग लगने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं। बुधवार को किशनपुर सेंक्चुरी की मैलानी रेंज (वन्यजीव विहार) में आग लगने से करीब 25 हेक्टेयर जंगल का ग्राउंड फ्लोरा जलकर नष्ट हो गया। हालांकि किसी वन्यजीव के हताहत होने की सूचना नहीं है। जंगल में आग की घटनाओं पर काबू पाने के लिए तमाम प्रयासों के बावजूद इन पर नियंत्रण तो आसान हुआ है, लेकिन घटनाओं में कमी नहीं आई है।
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बसंत के मौसम में पतझड़ होने से पूरा जंगल सूखी पत्तियों से पट जाता है। ऐसे में छोटी से चिंगारी आग का विकराल रूप धारण कर लेती है। आग लगने की घटनाओं की त्वरित सूचना के आदान-प्रदान के लिए सैटेलाइट से जोड़कर फायर अलर्ट शुरू किया गया है। सैटेलाइट के जरिए जंगल में आग लगने की घटनाओं की जानकारी तुरंत संबधित अधिकारियों और फील्ड कर्मियों को दी जाती है। कभी-कभी यह सिस्टम भी फेल हो जाता है। किशनपुर सेंक्चुरी में आग लगने की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ है कि आग लगने के काफी देर बाद वन कर्मियों को अपने स्तर से सूचना मिल पाई। तब जाकर जंगल में आग बुझाने के प्रयास शुरू हुए।
आग के विकराल रूप धारण करने पर सबसे ज्यादा नुकसान ग्राउंड फ्लोरा को होता है। आग में घास-फूस, दुर्लभ वनस्पतियां, जड़ी-बूटियां, उनके बीज तक जलकर नष्ट हो जाते हैं। छोटे-मोटे वन्यजीव भी इसकी भेंट चढ़ जाते हैं। इसके अलावा आग के विकराल रूप धारण करने पर जंगल में लगे बेशकीमती पेड़ झुलसकर सूख जाते हैं। इससे करोड़ों की वन संपदा का नुकसान होता है।
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ऐसे लगती है जंगल में आग
जंगल के रास्तों पर गुजरते राहगीरों के जलती बीड़ी, सिगरेट फेंक देने से या चरवाहों के खाना बनाते समय आग जलाने से जंगल में आग लगती है। कभी-कभी लकड़कट्टे अपना अपराध छुपाने के लिए जंगल में आग लगा देते हैं तो शिकारी शिकार के लिए भी आग लगाते हैं।
जंगल में आग लगने पर अपनाए जाते हैं ये उपाय
जंगल में लगी आग को रोकने के लिए वही परंपरागत तरीके अपनाए जा रहे हैं। हरी झाड़ियों को काटकर वन कर्मी उससे आग को पीट-पीट कर आग बुझाने का प्रयास करते हैं। हाल ही में वन विभाग ने आधुनिक कुछ फायर सिस्टम मंगाए हैं, उनका भी प्रयोग शुरू हो गया है। इससे जल्दी आग बुझाने में सहायता मिल रही है। जब आग विकराल रूप धारण कर लेती है तब फायर ब्रिगेड की भी मदद ली जाती है।
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