लखीमपुर खीरी। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी के चलते आज भी लोग मिर्गी के मरीजों के लिए झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं। चिकित्सकों का मानना है कि इससे मरीज की हालत और बिगड़ सकती है। ऐसे मरीजों को तंत्र-विद्या की नहीं, बल्कि चिकित्सकीय इलाज की आवश्यकता होती है।
जिला अस्पताल में प्रतिदिन करीब 800-1000 मरीजों की ओपीडी होती है। इसमें मानसिक रोगियों में प्रतिदिन करीब 100-150 मरीज शामिल होते हैं। बीते कुछ महीनों में ओपीडी में आने वाले मरीजों में करीब 20 प्रतिशत मिर्गी के रोगी हैं। जिला अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश शुक्ला ने बताया कि मिर्गी के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। इनमें बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हैं। कई मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, जहां आज भी लोग अंधविश्वास और झाड़-फूंक जैसे तरीकों का सहारा लेते हैं।
चिकित्सकों का कहना है कि मिर्गी का दौरा आने पर रोगी को तुरंत सुरक्षित जगह पर लिटाना चाहिए और उसके मुंह में कोई वस्तु नहीं डालनी चाहिए। जूते-मोज़े आदि सूंघाने लगना गलत है। दौरे के बाद मरीज को चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। चिकित्सक की देखरेख में दवा और नियमित इलाज की जरूरत होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तनाव, नींद की कमी, शराब और नशे का सेवन मिर्गी के दौरे को बढ़ावा देते हैं। वहीं, गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल न होने पर नवजात में भी मिर्गी की संभावना रहती है। समय पर इलाज न होने से यह गंभीर रूप ले सकती है।
-बचाव और देखभाल के उपाय-
पर्याप्त नींद लें और तनाव से दूर रहें।
दौरे की स्थिति में मरीज को सुरक्षित जगह पर लिटाएं।
शराब, नशे और अधिक स्क्रीन टाइम से बचें।
दवाएं डॉक्टर की सलाह के बिना न छोड़ें।
अंधविश्वास से बचें और तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें।