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मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने में होगा आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल

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बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व में मानव-वन्यजीव संघर्ष और जंगल में इंसानी घुसपैठ को रोकने से लेकर बाघों की गणना तक सभी कार्यों को आधुनिक रूप देने के लिए दुधवा मुख्यालय पर एक कार्यशाला हुई, जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर तरुण गुप्ता, निश्चल वर्मा, श्याम नरायन और शलिल गोयल ने हिस्सा लिया। उन्होंने मौजूद वनाधिकारियों को बताया कि वन और वन्यजीवों की सुरक्षा, घुसपैठ से लेकर मानव-वन्यजीव संघर्ष तक रोकने में किस तरह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
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दुधवा टाइगर रिजर्व के आसपास सैकड़ो गांव बसे हैं। जहां मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं आए दिन होती हैं। मानव-वन्यजीव प्रभावित क्षेत्र करीब दो सौ किलोमीटर लंबाई में फैला हुआ है। बाघ या जंगली हाथी जंगल से निकलकर खेतों में आते हैं तो कभी इंसान तो कभी उनके पालतू जानवर बाघों का शिकार हो जाते हैं। कभी-कभी बाघ या तेंदुए इंसानों के कोपभाजन बनते हैं। कानपुर आईआईटी से आई प्राफेसरों की टीम ने बताया कि एक विशेष तरह के कैमरे विकसित किए जा रहे हैं। यह कैमरे जंगल के अंदर स्थापित किए जाएंगे। इन कैमरों के सामने वन्यजीवों या इंसानों के गुजरने पर कंट्रोल रूम में लगे कंप्यूटर पर इनकी तस्वीर आ जाएगी। इससे बाघ, तेंदुआ, हाथी और जंगल में अवैध घुसपैठ करने वालों लोगों की लोकेशन पर नजर रखी जा सकेगी। इनके जंगल से बाहर की तरफ बढ़ने पर विभाग अलर्ट किया जा सकता है। इस तरह मानव-वन्यजीव संघर्ष और जंगल में इंसानी घुसपैठ रोकने में काफी सफलता मिल सकती है।
जीपीएस लोकेशन से लैस इन विशेष कैमरों का इस्तेमाल बाघों की गणना में भी किया जा सकेगा। उन्होंने दुधवा टाइगर रिजर्व से सटे हाथी प्रभावित क्षेत्र बौधिया कला के पास इस तकनीक का प्रदर्शन भी किया। जहां मौजूद दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के उपनिदेशक डॉ. अनिल कुमार पटेल को बताया कि हाथियों की लोकेशन कैमरों के जरिए पता लगने पर उन्हें जंगल के अंदर ही रोकने के प्रयास भी किए जा सकते हैं। कार्यशाला में दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डाइरेक्टर संजय पाठक, दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक मनोज सोनकर, डीएफओ साउथ समीर कुमार, वन्यजीव प्रतिपालक एसके अमरेश सहित सभी एसडीओ,रेंजर और वन कर्मी मौजूद रहे।
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