लखीमपुर खीरी। विधानसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी चुनाव प्रचार पर अधिकतम 40 लाख रुपये खर्च कर सकता है। इसके सापेक्ष अभी तक कुछ प्रमुख दलों के प्रत्याशी जरूर 10 लाख से अधिक धनराशि खर्च कर चुके हैं। पहली बार पांच सीटों पर चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों समेत अन्य छोटे दलों के प्रत्याशी भी लाखों रुपये खर्च कर जोर आजमाइश कर रहे हैं, जिनके जीतने की संभावनाएं नगण्य हैं पर वोटकटवा की भूमिका जरूर निभा सकते हैं।
जनपद की आठ विधानसभा सीटों पर भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस ने अपने-अपने प्रत्याशी उतारे हैं। वहीं आप समेत कई छोटे दलों व निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में हैं। सभी सीटों पर 65 कुल प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। इसमें प्रमुख चार दलों के 32 प्रत्याशियों को निकाल दें तो शेष 33 प्रत्याशी कहीं न कहीं वोटकटवा की भूमिका में नजर आ रहे हैं। वह इसलिए क्योंकि चुनाव प्रचार कर लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं। इससे एक-दो प्रतिशत मतदाता इनके पक्ष में गए तो प्रमुख दलों के प्रत्याशियों का ही वोट घटेगा।
हालांकि मुख्य रूप से मुकाबला दो दलों भाजपा व सपा के बीच ही सिमटता दिखाई दे रहा है, लेकिन बसपा व कांग्रेस प्रत्याशी भी जातिगत फैक्टर के सहारे लड़ाई में बने रहने की भरसक कोशिशें कर रहे हैं। इससे मतदाताओं ने भी चुप्पी साध रखी है। पहली बार जनपद की पांच सीटों पलिया, निघासन, गोला, श्रीनगर और मोहम्मदी से चुनाव लड़ रहे आप के प्रत्याशियों ने क्रमश: 148016 रुपये, 36575 रुपये, 202035 रुपये, 72520 रुपये और 501963 रुपये खर्च किए हैं। सबसे ज्यादा मोहम्मदी विधानसभा में आप प्रत्याशी ने पांच लाख से ऊपर चुनाव प्रचार में खर्च किया है। इससे यहां पर प्रमुख दलों के वोटबैंक में सेंध लग सकती है।
इसी विधानसभा में एक्शन पार्टी के प्रत्याशी ने 176495 रुपये चुनाव प्रचार पर खर्च किए हैं। श्रीनगर विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी प्रशांत राजवंश भी करीब दो लाख रुपये से अधिक चुनाव प्रचार में खर्च कर चुके हैं, जो भाजपा से टिकट न मिलने पर बागी के तौर पर मैदान में हैं। लखीमपुर से एएमआईएम प्रत्याशी उस्मान सिद्दीकी भी करीब एक लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। इसी सीट पर आम आदमी परिवर्तन पार्टी प्रत्याशी खुशी किन्नर भी 1.19 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। इसी तरह अन्य निर्दलीय प्रत्याशियों से 20 से 50 हजार रुपये तक खर्च कर दिए हैं। इनका मकसद जीतना भले ही न हो, लेकिन पिछले चुनावों की तरह इस बार भी कुछ वोट हासिल कर सकते हैं। जिसका असर प्रमुख दलों के बीच जीत-हार के अंतर पर पड़ सकता है।