श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष: कलयुग की जेल में भी हैं दर्द भरी सिसकियां
द्वापर युग में कृष्ण ने भले ही काल कोठरी की पीड़ा न झेली हो, लेकिन कलयुग में कई मासूम (कान्हा) जेल की घुटन भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। उनका न कोई अपराध है और न ही उन पर कोई रपट...पर उन्हें काल कोठरी में रहना पड़ रहा है।
द्वापर में कंस ने बहन देवकी और बहनोई वासुदेव को जेल की सलाखों में महज इसलिए डाल दिया था, क्योंकि उन्हें उनके आठवें पुत्र से अपनी मौत का भय था। द्वापर में तो कृष्ण के जन्म लेते ही जेल के द्वारपाल सो गए थे और वासुदेव की हथकड़ी-बेड़ियां खुल गईं थीं और वह कृष्ण को लेकर यशोदा के घर पहुंचा आए थे, लेकिन कलियुग की जेल में कई मासूम काल कोठरी में जीने को मजबूर हैं। वह जेल में सिर्फ इसलिए घुट रहे हैं, क्योंकि उनकी परवरिश करने वाले भी कारागार में हैं।
हत्या के आरोप में बंद रेनू के साथ चार साल के अमन हों या रुखसाना के साथ डेढ़ साल का फैजल हो तो दहेज एक्ट की सजा काट रही दादी के साथ डेढ़ साल का प्रियांशू हो या फिर दादी चंद्रकली के साथ मोहित...सभी मासूम बिना किसी अपराध के जेल के सींखचों में कैद हैं। उन्हें न तो जन्माष्टमी के महत्व का भान है और न ही काल कोठरी में बंद होने का। उनके साथ बंद दादी या फिर मां इन मासूमों का चेहरा देखकर बार-बार शायद यही सोचकर सिसक उठती हैं कि कब इनका बचपन लौटेगा, कब वे खुली हवा में खेलेंगे और कूदेंगे। कुल मिलाकर चाहें द्वापर की देवकी हों या फिर कलयुग में दहेज एक्ट में बंद दादी और बुआ, मासूम कान्हा का चेहरा देख-देखकर सिसकती नजर आती हैं क्योंकि आज के कान्हा जेल में घुट जो रहे हैं।