शारदा नदी अकालगढ़ को तो निगल चुकी है। अब उसके निशाने पर दंबलटांडा का इलाका है। जिसे दो साल पहले खुद सिख फार्मरों ने अपने पैसे से ठोकर बनाकर शारदा को रोक दिया था।
शारदा नदी ने चार साल पहले कटान करके दंबलटांडा के घरों को अपने साथ बहा ले गई थी। उस समय गांव के बाहर बची इकलौती कोठी सुरेंद्र सिंह एवं हरेंद्र सिंह व उनके परिवार की बची थी। साल 2014 में कटान को देखते हुए पूरे परिवार ने अपने पैसों से बैंबू कैरेट लगाकर एवं जाल लगाकर ठोकर बनाई थी, जिसमें स्थानीय लोगों ने भी सहयोग दिया था। दंबलटांडा की कोठियों तक शारदा पहुंच गई है। शारदा जिस हिस्सेे को इस समय काट रही है वह भूड़ का हिस्सा है। भूड़ में कटान तेजी से होता है। अगर दंबलटांडा की रोड को काटकर शारदा आगे बढ़ तो पहले से विस्थापित दंबलटांडा, रामनगर, रमेश्वरापुर, रैनागंज एवं दौलतापुर के लोग पुन: निशाने पर आ जाएंगे।
अब तो जियो ट्यूब का ही सहारा
अकालगढ़ में पहले बैंबू कैरेट से काम शुरू किया गया था, तभी शारदा तेजी से बढ़ गई। लेकिन जियो ट्यूब के मिलने पर काफी हद तक शारदा को रोकने की कोशिश हुई थी। मौजूदा समय में अकालगढ़ के बचे हिस्से में जिस तरह जियो ट्यूब लगाए गए हैं। अगर ऐसे ही दंबलटांडा वाली डामर मार्ग के किनारे ठोकरें बन जाएं तो मुमकिन है कि इस इलाके को बचाया जा सकता है।