लखीमपुर खीरी। युवराज दत्त महाविद्यालय में दो दिवसीय अंतरानुशासनीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयाग के डॉ विनम्र सेन सिंह ने कहा कि रीतिकालीन साहित्य को जन विरोधी कहना ऐतिहासिक भूल है। इस साहित्य में संगीत, कला, शृंगार और लोक संस्कृति की समवेत और अस्मिता-परक प्रस्तुति है। उन्होंने कहा कि रीतिकाल के कवियों की रचनाओं में गहन सामाजिक चिंताएं हैं, जो भक्ति युग से लेकर रीति युग तक खूब दिखाई दी।
रविवार को सभागार में डॉ. पुनीत बिसारिया ने हिंदी साहित्य के नए नामकरण की प्रस्तावना दी और वाचिक, सात्विक, कायिक और आहार्य विषयों पर विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि उत्तर मध्यकालीन कवि केशव हृदयहीन नहीं थे। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के डॉ. मुन्ना तिवारी ने उत्तर मध्यकाल में आलोचना दृष्टि के भटकाव पर चर्चा करते हुए रीतिकालीन आचार्यों द्वारा हिंदी का निजी काव्यशास्त्र रचने की विवेचना की। डॉ. माधव प्रसाद चतुर्वेदी ने उत्तर मध्यकालीन भारतीय संगीत में आए अनेक परिवर्तनों पर अपने शोध प्रस्तुत किए। जयप्रकाश विश्वविद्यालय छपरा बिहार के डॉ. सिद्धार्थ शंकर ने अंग्रेजी साहित्य के वीएस नायपाल, कुरतुल ए हैदर द्वारा भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में किए गए योगदानों पर व्याख्यान देते हुए कहा कि हम मध्यकाल में फारसी और अंग्रेजी के दबाव के आगे बढ़ते रहे, जिसका परिणाम यह रहा कि ऐतिहासिक परिस्थितियों ने हमें उस रूप में निर्मित किया, जिसे हम नहीं चाह रहे होंगे। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर सदानंद गुप्ता, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस के प्रोफेसर वशिष्ठ, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्राचार्य प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने भी संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा और रीतिकालीन काव्य एवं सौंदर्य का तात्पर्य और रीतिकालीन कवियों के सौंदर्य बोध पर व्याख्यान प्रस्तुत की। इस मौके पर वाईडी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. डीएन मालपानी, डॉ. जेएन सिंह, डॉ. सुुुुभाष चंद्रा, डॉ सत्येंद्र दुबे, डॉ. विशाल द्विवेदी आदि मौजूद रहे।