धौरहरा। कफारा के आशापूर्णा मंदिर में 1707 ईसवी में बेशकीमती अष्टधातु की देवी प्रतिमा स्थापित थी। दो दशक पहले चोरों ने मंदिर से आशापूर्णा देवी की मूर्ति चुुरा ली। पुलिस ने देवी प्रतिमा तो बरामद कर ली, लेकिन 23 साल बाद भी मूर्ति का रिलीजिंग ऑर्डर नहीं आ सका। लिहाजा, बेशकीमती और जन आस्था का केंद्र रही मूर्ति पुलिस के मालखाने में रखी है।
देवी आशापूर्णा आजादी के रणबांकुुरे राजा ज्योति सिंह की कुल देवी थीं। लखीमपुर मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर धौरहरा तहसील का कफारा गांव ईसानगर स्टेट के जागड़ा राजवंश की रियासत का हिस्सा था। दो सौ साल पहले जांगड़ा वंश के तत्कालीन राजा ज्योति सिंह ने कफारा में लाल पत्थर से रानी महल मंदिर बनवाया था। इस मंदिर में महिषासुर मर्दिनी महाकाली स्वरूपा मां आशापूर्णा की मूर्ति स्थापित कराई। राजा ज्योति सिंह के रिश्तेदार राजा सुरेंद्रवीर विक्रम सिंह, महारानी अंबरि कुंवरि के साथ मंदिर में ही निवास करते थे। 1857 में राजा सुरेंद्रवीर विक्रम सिंह को अंग्रेजी हुकूमत से बगावत और राजा ज्योति सिंह का साथ देने के आरोप में गिरफ्तार कर काला पानी की सजा दी गई। महारानी अंबरि कुंवरि अकेली रह गईं। कुछ अंतराल में ही सुरेंद्रवीर विक्रम की भी मौत हो गई। रानी यह सदमा बर्दाश्त न कर सकीं और तीसरे महीने उनकी भी मौत हो गई। रानी की मां आशापूर्णा के प्रति गहरी आस्था थी। उनकी मौत के बाद देवी आशापूर्णा मंदिर को जनता ने रानी मंदिर का नाम दे दिया। अब तक भक्तों की मां के प्रति आस्था में किसी प्रकार की कमी नहीं आई।
भक्त नवरात्र में यहां जागरण समेत अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। राजा सुरेंद्रवीर विक्रम सिंह की तीसरी पीढ़ी के वंशज राजा राजेंद्र प्रताप सिंह के अनुसार वर्षों पुरानी ऐतिहासिक धरोहर को वे संभाल नहीं सके। देवी आशापूर्णा की मूर्ति अक्तूबर 1995 में चोरी हो गई। चोरी के आरोपी जेल गए। बाद में वह जमानत पर भी छूट गए, लेकिन मां आशापूर्णा की मूर्ति मालखाने में जमा हो गई। वहीं, लाल पत्थर से बना ऐतिहासिक रानी महल अब खंडहर हो चुका है।
बताते हैं कि चोरी की घटना के वक्त अष्टधातु से बनी इस मूर्ति की कीमत पांच करोड़ रुपये थी। वहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक अब मूर्ति की कीमत अब ज्यादा हो चुकी है। मंदिर के आस-पास रहने वाले बुजुर्गों की मानें तो यह मूर्ति काली कामाक्षा देवी कलकत्ता की मूर्ति के सांचे में ढली थी। मान्यता है कि भले ही देवी आशापूर्णा मां धौरहरा कोतवाली के मालखाने में मुकदमाती सामग्री के रूप में कैद हैं, लेकिन वह अपने भक्तों की मन्नत पूरी करती हैं। मंदिर में जो भी श्रद्धालु मनौती मांगता है, तो वह पूरी होती है।