कस्बे की एक महिला किसान ने फूलों की खेती शुरू कर क्षेत्र के किसानों को खेती में मुनाफे की राह दिखाई है। यूं तो कस्बे के पढ़े-लिखे प्रगतिशील किसान खेती में आधुनिक और नए-नए प्रयोग लंबे अरसे से करते आ रहे हैं लेकिन इस महिला किसान ने जो कर दिखाया वह यहां के किसानों ने सोचा भी नहीं था। उनकी मेहनत का यह नतीजा हुआ कि आज प्रदेश के कई जिले बांकेगंज के फूलों से महक रहे हैं।
बांकेगज कस्बे के मोहल्ला झालापुरवा के प्रगतिशील किसान यदुनंदन सिंह पुजारी के पास दो हेक्टेयर जमीन है। उसकी शादी पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के दुर्गापुर शहर की गायत्री से हुई। गायत्री ने यहां आकर देखा कि कभी मौसम की मार से तो कभी कीटों के प्रकोप से फसल चौपट हो रही है। लागत और मेहनत के अनुपात में परंपरागत खेती से उतना लाभ नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए। इस पर उसने कुछ नया करने की ठानी। जैसे-तैसे कर उसने एक एकड़ जमीन अपने नाम खरीदी, और इस जमीन पर दो साल पहलेे उसने गेंदे के फूलों की खेती शुरू की। पहले लोगाें ने उसका मजाक बनाया, लेकिन पहले ही साल में उसे गेंदे की फूलों की खेती से अच्छा मुनाफा हुआ। अब उसने फूलों की बिक्री के लिए प्रदेश के कई जिलों में मंडी तलाश की है और वहां फूल बेचने के भेजने शुरू कर दिए हैं। आज उसके खेतों के फूल सीतापुर, लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर, पीलीभीत, बरेली, बदायूं, गढ़मुक्तेश्वर और दिल्ली तक बिक रहे हैं।
--
कोलकाता से लाकर लगाई पौध
बांकेगंज की महिला किसान गायत्री ने दो साल पहले कोलकाता से पौध लाकर यहां गेंदे के फूलों की खेती शुरू की। फूलों को यहां की मिट्टी और जलवायु रास आई और अंतत: मुनाफे का सौदा साबित हुई।
--
एक साल में तीन बार लगाई जाती है पौध
साल में चार महीने के अंतराल जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितंबर-अक्तूबर के महीनों में गेंदे की पौध खेतों में लगाई जाती है। 90 दिन के बाद फसल तैयार होकर फूल तोड़ने लायक हो जाते हैं।
--
कम लागत, अधिक मुनाफा
एक एकड़ गेंदे के फूलों की खेती में करीब 10 हजार रुपये की लागत आती है। एक बार पौध लगाने के 90 दिन बाद चार से पांच दिन के अंतराल में फूल तोड़े जाते हैं। फसल उत्पादन 30 से 40 क्विंटल प्रति एकड़ होता है। बाजार में फूलों की बिक्री तीन से चार हजार रुपये प्रति क्विंटल होती है।