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एनबीडब्लू तो छलावा, राजनैतिक दबाव जारी

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लखीमपुर खीरी । पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों को किस तरह गुमराह करती है, इसकी बानगी बीडीओ सुसाइड मामलें में साफ दिख रही है। वीडीओ त्रिवेद्र की खुदकुशी के मामले में भी पुलिस होमवर्क के बजाय कागजी घोड़े दौड़ाने में व्यस्त है। खुदकुशी के लिए प्रेरित किया जाना 10 वर्ष के कारावास से दंडित अजमानतीय और सेशन ट्रायल मामला है। इसमें पुलिस को प्रारंभ से ही बिना वांरट गिरफ्तारी की शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव में पुलिस पूरे मामले को उलझाने में लगी है।
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कोतवाली सदर के शिवकालोनी निवासी वीडीओ त्रिवेंद्र ने फांसी के फंदे पर झूलकर जान दे दी। अपने सोसाइड नोट में वीडीओ ने अपनी मौत के लिए भाकियू नेताओं और पूर्व प्रधानों को जिम्मेदार ठहराया। वीडीओ के पिता ने नौ आरोपियों के खिलाफ पुलिस को तहरीर दी। पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन बाकी आरोपी लखनऊ में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं। इनको सत्ता पक्ष के एक विधायक समेत कुछ राजनीतिक हस्तियों का संरक्षण प्राप्त है।
नहीं जुटाई फोरंसिक रिपोर्ट
मृतक त्रिवेंद्र के सुसाइड नोट की लिखी लिखावट को भी फोरंसिक सबूतों के सहारे पक्का करने की जहमत नही उठाई, न ही उसके मोबाइल काल डिटेल खंगालकर यह जानने का प्रयास किया आखिर किन किन व्यक्तियों नेताओं और अफसरों का उस पर प्रेशर था, उसके सर्विस रिकार्ड को लेकर पूर्व में दिए गए उसके प्रार्थना पत्रों को भी तफ्तीश में नही शामिल किया गया।
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तफ्तीश में नहीं शामिल हुई अफसर की भूमिका
वायरल वीडियों में किसान महापंचायत में मौजूद तहसीलदार गोला के सामने ही माइक थमाकर त्रिवेद्र को संबोधित किया जा रहा है, वहीं आला अधिकारी के तौर पर आपत्ति जताने के बजाय तहसीलदार मुस्कुराते हुए नजर आ रहे है, इस वीडियों के वायरल होने के बाद से तहसीलदार की भूमिका पर सवाल उठ रहा है लेकिन पूरी विवेचना में इस ऐंगल पर कोई भी तफ्तीश नही की गई।
सांठ-गांठ आरोपी को न दिला दे स्टे
बिना मुकम्मल लिखापढ़ी और तैयारी के ही केस डायरी से पर्चा काटकर एनबीडब्लू लिए जाने के लिए केस डायरी और पर्चे न्यायिक प्रकिया में पहुंचे भले ही अदालत ने एनबीडब्लू के आदेश चारों मुल्जिमानों के लिए जारी कर दिए हों, लेकिन यह सवाल लाजमी हो गया है कि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्य की कसौटी पर विवेचना को कितना मजबूत किया गया है, अदालती प्रक्रिया से जुड़े लोग भी मानते हैं कि कहीं इसी वारंट के आधार पर मुल्जिमान अरेस्ट स्टे की पटकथा तो नही लिखी रही हैं। क्योंकि मुज्जिमान को गिरफ्तार करने की तो पुलिस के पास पहले ही शक्तियां थी।
इससे पहले भी हो चुका है इसी तरह का खेल
हैदराबाद थाना क्षेत्र के किसान ओम प्रकाश की जिसे चकबंदी के नाम पर उसकी जमीन से महरूम कर दिया, उच्चाधिकारियों के सामने किसान ओम प्रकाश लगातार एक साल से प्रार्थना पत्र देता रहा, डीएम उसे एसडीएम के लिए भेजते थे तो कभी डीडीसी के रूप में काम देख रहे एडीएम अरूण सिंह के पास लेकिन हर बार में उसकी फरियाद अनसुनी रह गई साल भर से अधिक दौड धूप करने के बाद आखिर सिस्टम से हारकर ओमप्रकाश ने फांसी पर लटक कर जान दे दी थी। इस मामले में भी मरने से पहले उसने सुसाइड नोट भी छोड़ा था जिसमें ग्राम प्रधान और दूसरे आरोपी को नामजद भी िया था। पुलिस उलझाती रही इधर आरोपी प्रधान को अरेस्ट स्टे मिल गया।
कहीं पुलिस की जुगलबंदी से तो नही मिला स्टे
बात करते है, लेकिन त्रिवेंद्र के जैसे ही मामले में पहले तो पुलिस तेजी दिखानी की जुबाबंदी करती रही वहीं आरोपियों को केस से जुडे पर्चे तक पहुंच गए लिहाजा वह तकनीकी बिंदु रखते हुए कोर्ट से अरेस्ट स्टे पाने में कामयाब हो गए अब पुलिस यह कहकर जिम्मेदारी से बच रही है कि मुल्जिमान हाईकोर्ट से स्टे पर है।
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