आज भी दी जाती है नंगाराम की सादगी की मिसाल
अपना लेटर पैड और मोहर हर समय रखते थे साथ
1977 में पैला विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते नंगाराम जैसा कोई दूसरा विधायक जिले में फिर नहीं हुआ। सादगी और ईमानदारी की मिसाल देनी हो तो जिले में आज भी उनका नाम लिया जाता है। लोग अपने कामों के लिए उनके दरवाजे तो पहुंचते ही थे, अक्सर वह खुद लोगों की समस्याएं पूछने क्षेत्र में निकल जाते थे। जो भी फरियाद लेकर उनके पास आया, कभी निराश होकर नहीं लौटा।
उस दौरान नंगाराम के साथी रहे बांकेगंज निवासी 72 वर्षीय सगीर अहमद बताते है कि नंगाराम अनपढ़ थे। दस्तखत करना उन्होंने विधायक बनने के बाद सीखा। जब वह विधायक बने तो उनके पास लोग काम के लिए आने लगे। भोर से ही उनके दरवाजे पर फरियादियों की भीड़ लग जाती थी। नंगाराम जो भी बन पड़ता था, उनके लिए करते थे। विधायक होने का गुमान उनमें दूर-दूर तक नहीं था। अपना लेटर पैड और मोहर हमेशा उनकी जेब में रहती थी। गांवों में भ्रमण के दौरान फरियादी जो काम बताते, वह तुरंत अपने सहायक से संबधित अधिकारी के नाम चिट्ठी लिखवाकर उस पर मोहर लगा देते थे। यदि किसी का काम लखनऊ में होता तो उसे अपने खर्चे पर लखनऊ ले जाते और उसका काम करा लाते।
साधारण सी धोती और कुर्ता नंगाराम का लिबास था। 1980 में जब पर्याप्त साधन और संसाधन विकसित हो चुके थे, तब भी विधायक नंगाराम पैदल या साइकिल पर ही घूमते ते। समय निकालकर हफ्ते में एक-दो दिन बांकेगंज की मेन मार्केट में आकर लोगों का हाल-चाल लेना उनकी आदत में शुमार था। लखनऊ में उनका विधायक निवास हमेशा क्षेत्र के लोगों से भरा रहता था। गरीब होने के बावजूद विधायक नंगाराम आने वाले लोगों का पूरा खर्च उठाते थे। क्षेत्र में किसी भी गरीब की बेटी की शादी हो, उसमें जरूर पहुंचते थे। नंगाराम के बाद इतना सीधासादा विधायक दूसरा नहीं हुआ।
सगीर अहमद बताते है कि नंगाराम की प्रेरणा से वह भी सन 1980 में हैदराबाद निर्वाचन क्षेत्र से लोकदल से चुनाव लडे़ लेकिन जीत नहीं पाए। नंगाराम की सादगी और सरलता के वह कायल है। वह कहते हैं कि यदि ऐसे जनप्रतिनिधि हों तो देश से भ्रष्टाचार खुद ही खत्म हो जाएगा।
(बांकेगंज निवासी सगीर अहमद से बातचीत पर आधारित)