लखीमपुर खीरी। नए कृषि कानून को लेकर पूरा विपक्ष केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद है लेकिन जिले के किसानों की इस पर मिलीजुली राय सामने आई है। कुछ किसान जहां इस मामले में पूरी तरह उदासीन नजर आ रहे हैं वहीं कुछ किसानों ने किसान आंदोलन का समर्थन किया है।
बांकेगंज के अधिकतर किसानों का कहना है कि नए कृषि कानून से कोई खास अंतर पड़ने वाला नहीं है बल्कि छोटे किसानों को फायदा भी होगा। बड़े किसानों की मुनाफाखोरी में कुछ कमी जरूर आ सकती है। किसानों का मानना है कि उनकी आड़ में विपक्ष अपने फायदे के लिए रोटियां सेंक रहा है। वहीं, गोला के किसानों का मानना है कि सरकार की नीतियां किसान विरोधी हैं। कृषि कानून लागू होने से और अधिक नुकसान होगा, साथ ही किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य भी नहीं मिलेगा जैसा कि इस बार धान बिक्री में देखने को मिला है।
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क्या कहते हैं किसान
नया कृषि कानून किसानों के लिए फायदेमंद
क्षेत्र के किसान रमेश कुमार भार्गव कहते हैं कि अधिकतर छोटे काश्तकार संसाधन विहीन हैं। ऐसे में ठेके पर खेती फायदेमंद साबित होगी। किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सकेगा।
किसानों की आड़ में विपक्ष कर रहा राजनीति
किसान विजय सिंह का कहना है कि विपक्ष कुछ बड़े किसानों को लेकर किसान आंदोलन को तूल दे रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि अधिकतर किसान इस नए कानून के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते। विपक्षी पार्टियां उन्हें वरगला रहीं हैं।
एमएसपी तय होने से किसानों को मिलेगा फायदा
किसान कौशल किशोर का कहना है कि अधिकतर छोटे किसान अपनी उपज मंडियों में नहीं बेच पाते। उन्हें औने-पौने दामों में फसल बिचौलियों के हाथ बेचनी पड़ती है। ऐसे में नए कृषि कानून के तहत छोटे किसानों को समर्थन मूल्य मिलने की गारंटी होगी।
किसान अपनी लड़ाई लड़ने में खुद सक्षम
किसान सुभाष कुमार का कहना है कि किसान अपनी लड़ाई लड़ने में खुद सक्षम है। उन्हें विपक्ष के हाथों की कठपुतली नहीं बनना चाहिए। केंद्र सरकार किसानों के हित में नया कृषि कानून लेकर आई है। इसमें फायदे नुकसान की समीक्षा के बाद ही निर्णय लेना चाहिए।
किसान विरोधी कानून के खिलाफ छेड़े गए आंदोलन का हम समर्थन करते हैं। किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य और तुरंत भुगतान मिलना चाहिए। दिन रात मेहनत कर फसलें पैदा करते हैं।
-लखपति सिंह ,तलफीपुर (ममरी)
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सरकार ने जो कृषि कानून बनाए हैं, उससे किसानों का भला होने वाला नहीं है। इस किसान विरोधी कानूनों को वापस कराने के लिए चल रहे आंदोलन का हम समर्थन करते हैं।
-डोरे लाल, बाबागंज (ममरी)
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दो एकड़ का जोतकार हूं, तीन बीघे गन्ना खड़ा है। धान उपज से 40 क्विंटल धान सरकारी सेंटर पर सरकारी रेट में ही बेचा है। कोई असुविधा नहीं हुई। गेहूं की सिंचाई करनी है, पर्ची आ गई गन्ना छीलकर चीनी मिल ले जाना है। हमे हड़ताल के चक्कर में नहीं पड़ना।
-सुरेशचंद वर्मा, सेमरिया (अलीगंज)
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यह कानून किसान विरोधी है, जो किसान आंदोलन कर रहे हैं वह बिल्कुल सही कर रहे हैं। इस कानून में सुधार किया जाए तो सही होगा। किसान तो पहले से ही गन्ना मूल्य भुगतान, धान बिक्री से परेशान हैं। पिछले साल के गन्ने का पैसा अभी नहीं मिल पाया है। इस बिल को खारिज करके दोबारा नया किसानों की राय लेकर कानून बनाया जाए।
-गुरचरन सिंह चीमा, सिकंदरपुर (कुकरा)
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किसान खेतों पर दिख रहे है । गन्ने की कटाई सहित गेहूं, आलू और सरसों के खेतों में किसान काम कर रहे है । उन्हें आंदोलन की वास्तविकता ही नही पता है। फिलहाल किसानों को उनकी फसल का वाजिब मूल्य नही मिल रहा है।
-अनूप कुमार गुप्ता, पसगवां
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सरकार के कृषि कानूनों की सही जानकारी नही हैं । क्षेत्र की नकदी उपज गन्ना है, सरकार गन्ने का वाजिब मूल्य घोषित करे और गन्ना मूल्य का भुगतान सही समय पर कराए। राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारी व किसान नेता पुलिस को अपने यहां बुलाकर महज फोटो खिंचाने तक ही सीमित हैं। यहां किसान अपने कार्यों में व्यस्त है ।
-सर्वेश कुमार, नया गांव किशोरी
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पिछले साल खुले बाजार 22 सौ रुपये प्रति क्विंटल बिका था गेहूं
बिजुआ। बिजुआ के बस्तौली गांव के दिलबाग सिंह कहते हैं कि नए कृषि कानून इतने ही सही होते तो खुले बाजार में समर्थन मूल्य से ज्यादा फसल का दाम तो मिलता। वह कहते हैं कि बीते साल गेहूं 22 सौ प्रति क्विंटल बिक गया था, इस बार तो सरकारी रेट से कम भाव ही मिल रहा है। वहीं धान सरकारी केंद्र पर तो बिका नहीं, अलीगंज में प्राइवेट मिल में एक माह के उधार पर 12 सौ प्रति क्विंटल के भाव पर गेहूं बेच के आए हैं। संवाद