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घर आए 60 में से 12 हजार मजदूरों को ही मिल पाया काम, 42 हजार लौट गए

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लखीमपुर खीरी। लॉकडाउन के दौरान दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब समेत अन्य दूसरे राज्यों से प्रवासी श्रमिकों के आने का सिलसिला लोगों को याद ही होगा, तब करीब 60 हजार प्रवासी श्रमिक अपने घरों को लौटे थे। उन्हें लाने और उनके घर तक पहुंचाने के भारी बंदोबस्त भी हुए थे। इसमें अब अनलॉक होने के बाद काम न मिलने से परेशान करीब 70 फीसदी (करीब 42 हजार) प्रवासी श्रमिक फिर से दूसरे राज्यों में पुराने काम पर लौट चुके हैं। लौटने वाले प्रवासियों में ज्यादातर कुशल और अर्धकुशल श्रमिक थे, जिन्हें जनपद में रोजगार नहीं मिल पाया था। इसके विपरीत सरकार का दावा था कि घर लौटने वाले सभी मजदूरों को काम-धंधा मुहैया कराया जाएगा।
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प्रवासियों को रोजगार दिलाने के लिए तब प्रदेश सरकार ने जिला रोजगार समिति का गठन भी किया, लेकिन अब तक 12 हजार प्रवासियों को ही रोजगार दिया जा सका है। इनमें ज्यादातर 10,900 प्रवासियों को मनरेगा में कार्य मिला। शेष 1100 श्रमिकों को भी पीडब्ल्यूडी, जिला पंचायत राज के निर्माण कार्यों में मजदूरी का काम मिल पाया। गरीब तबके के प्रवासी श्रमिक लॉकडाउन के दौरान हुई परेशानियों का दर्द अभी नहीं भूले हैं, जिससे वे लोग अपने गांव में ही दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन-यापन कर रहे हैं। मनरेगा से गरीब तबके के प्रवासी श्रमिकों को सबसे ज्यादा रोजगार भी मिल पाया है। लॉकडाउन से (21 अप्रैल 2020 से) अब तक मनरेगा से 70 लाख मानव दिवस सृजित किए जा चुके हैं।
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बोले प्रवासी
हम पंजाब के जालंधर जिले के कैंट में एक दुकान पर काम करते थे। अपने परिवार को छोड़ कर जाना अच्छा नहीं लगता। यहां मजदूरी के लिए संसाधन बढ़ाने की जरूरत है। सरकार कोशिश करे तो समस्या का हल हो सकता है।
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-दुर्गेश मिश्रा निवासी ईसानगर
महानगरों में अच्छी कमाई तो हो जाती है, लेकिन कई परेशानियां भी रहती हैं। घर पर चार पैसे कम मिलें तो भी अच्छे होते हैं, क्योंकि हम परिवार के साथ होते हैं। प्रशासन अगर गांव में ही काम दिलाएगा तो हम अन्य शहरों में नहीं जाएंगे।
-सुशील मिश्रा निवासी ईसानगर
मजबूरी में लोग बाहर जाते हैं। राज्यों में अलग-अलग तरह की कंपनियां हैं, जिसमें रोजगार और बेहतर मजदूरी भी मिलती है। निराशा होती है कि यहां कुछ नहीं है।
- मनीष कश्यप निवासी बालूपुरवा
पंजाब में एक धान मिल में काम करते थे। लॉकडाउन की वजह से काम धंधा बंद हो गया। खाने रहने की दिक्कत होने लगी मजबूरी में घर वापस आना पड़ा। गांव में ही रोजगार मिले तो पलायन की कोई सोचेगा भी नहीं।
- जग्गू निवासी ईसानगर
10,900 प्रवासी श्रमिकों को मनरेगा से काम दिलाया जा चुका है। कुशल और अर्धकुशल श्रमिकों के लिए भी दूसरे विभागों से रोजगार दिलाया गया है। हालांकि दूसरे राज्यों से आए श्रमिकों में काफी तकनीकी काम करने वाले श्रमिक भी थे, जो अनलॉक होने पर वापस काम के लिए दूसरे राज्यों में चले गए हैं।
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-राजनाथ प्रसाद भगत, उपायुक्त, श्रम रोजगार
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