रावण से जुड़ी किंवदंती
एक किंवदंती के अनुसार, लंकापति रावण शिवजी को कांवड़ में लेकर लंका जा रहा था। शिवजी ने शर्त रखी थी कि यदि उन्हें कहीं रख दिया गया तो वे वहीं स्थापित हो जाएंगे। गोला गोकर्णनाथ पहुंचने पर रावण को लघुशंका महसूस हुई। उसने एक चरवाहे को कांवड़ पकड़ा दी और नित्य कर्म से निवृत्त होने चला गया। शिवजी ने अपना भार बढ़ाकर स्वयं को वहीं स्थापित कर लिया। रावण के लौटने पर उसने चरवाहे का पीछा किया, जो भय से कुएं में कूद गया। इसी घटना के बाद यह स्थान भूतनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
मेले का अनूठा स्वरूप
बाबा भूतनाथ का मंदिर रेलवे लाइन किनारे वन क्षेत्र से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर प्राकृतिक वातावरण में है और यहां भव्य मेला लगता है। मेले में आए भक्त मंदिर और कुएं में गिटकी फेंककर हू-हू की आवाजें निकालते हैं। वे पतावर में मनोकामना लेकर गांठ बांधते हैं। दूरदराज से आए ग्रामीण श्रद्धालु ढोलक, मंजीरा, चिपटा और झांझ जैसे वाद्य यंत्रों पर लोक नृत्य करते हैं। वे आल्हा, सावन गीत और भजन गाकर मेले में विशेष आकर्षण पैदा करते हैं।
विलुप्त होती वस्तुओं का बाजार
भूतनाथ मेले में आधुनिकता के दौर में विलुप्त होती कई वस्तुएं देखने को मिलती हैं। लोग इन वस्तुओं को खरीदने के लिए दूर-दूर से आते हैं। मेले में हसिया, खुरपी और बैलों के गले में बांधने वाले घंटे मिलते हैं। पसाई के चावल, चिलम और नारियल के खोल से बने हुक्के भी यहां उपलब्ध होते हैं। लकड़ी का फर्नीचर और कंदमूल फल भी बेचे जाते हैं। कहा जाता है कि कंदमूल फल भगवान श्रीराम ने वनवास के समय खाए थे।