भगवानदीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय के स्वर्ण जयंती समारोह मल्हार के अंतर्गत बृहस्पतिवार को अवधी भाषा और साहित्य का वर्तमान परिदृश्य विषय पर अंतर्राष्ट्रीय विचार संगोष्ठी शुरू हुई। उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और आर्यकन्या महाविद्यालय के संयुक्त सौजन्य से हुई इस गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. धर्मपाल मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। गोष्ठी में देश के विद्वानों के साथ नेपाल और श्रीलंका के विद्वान और साहित्यकार शामिल रहे।
गोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. धर्मपाल ने कहा कि अवधी एक जीवंत भाषा है। इसमें जो मिठास है, वह दूसरी किसी भाषा में नहीं। राम चरित मानस पद्मावत इस बात के प्रमाण हैं। अवधी सशक्त भाषा है, यह नेपाल के अलावा फिजी, सूरीनाम और मारीशस में भी बोली जाती है। रामचरित मानस का सूर्य कभी अस्त नहीं होता। हमें अपनी भाषा की जरूरत महसूस करनी चाहिए, तभी बोली प्रसारित हो पाएगी और सम्मान पा सकेगी। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार से नेपाल तक अवधी का प्रसार है। रामचरित मानस की रचना जिस भाषा में की गई उसकी तुलना संसार की किसी भाषा से नहीं हो सकती। अवधी की किस्सागोई प्रकृति इसकी विशेषता है।
मुख्य वक्ता काठमांडू नेपाल से आए डॉ. गंगा प्रसाद अकेला ने कहा कि भाषा कोई भी हो हमें एक दूसरे से जोड़ती है। मिथिला की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि मिथिला के घर-घर में रामचरित मानस का पाठ होता है। साहित्य हमारी संस्कृति को बचाकर रखती है। हमारे आधारभूत स्थल को मजबूत होना अनिवार्य है। अपनी भाषाओं को बचाकर रखना हमारी जिम्मेदारी है। मिथिला की ग्रामीण महिलाएं अपनी संस्कृति को सुरक्षित कर रही हैं।
डॉ. योगेश प्रवीन ने कहा कि लखीमपुर खीरी जिला अवध का मुकुट है। बंशीधर शुक्ल की रचनाएं अवधी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। अवधी की कहावतों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि अवधी में एक से एक अबूझ पहेलियां मौजूद हैं, जिन्हें अमीर खुसरो भी अयोध्या प्रवास के दौरान भी नहीं जान पाए। अवधी के पास सौंदर्य और रोचकता है, इसे नई पीढ़ी को जानने की जरूरत है। नागपुर से आए प्रो. यज्ञ प्रसाद तिवारी ने कहा कि हर भाषा के समानांतर दूसरी भाषा चलती है। दूसरे देशों में बातचीत करने में अवधी और भोजपुरी का इस्तेमाल होता है, उसमें अवधी की संख्या अधिक है। अवधी की शब्दावली में दूसरी भाषाओं से अधिक संपन्नता है, क्योंकि इसका वर्ग सुनिश्चित है।
लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो. ऊषा सिन्हा ने बैसवारी पर चर्चा करते हुए कहा कि अवधी की उपभाषा बैसवारी है। साहित्यिक दृष्टि से अवधी भाषा काफी वैज्ञानिक है।
अमेठी से आए डॉ. जगदीश पीयूष ने कहा कि लखनऊ विश्वविद्यालय से ही अवधी की पढ़ाई शुरू हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. निरुपमा अशोक ने यह जिला अवधी भाषा और साहित्य की आत्मा है। उन्होंने संगोष्ठी में आए सभी विद्वानों का परिचय दिया और स्मृति चिह्न देकर स्वागत किया। विषय प्रवर्तन डॉ. वीना रानी गुप्ता ने किया।