लखीमपुर खीरी। रंग-गुलाल के साथ व्यंजनों का पर्व होली मिलावट से बदरंग हो सकता है। मिलावटी और सिंथेटिक मावा का व्यापार होली नजदीक आते जोर पकड़ने लगा है। मावे की सफेदी देखकर खरीदारी करने की गलती सेहत पर खासा असर डाल सकती है। लिहाजा बाजार में खोया खरीदते समय असली-नकली की पहचान करना जरूरी है।
होली पर अतिथियों का स्वागत गुझियों से करने की परंपरा है। जिससे लगभग प्रत्येक घर में गुझिया बनाने के लिए मावा खरीदा जाता है। जनपद की आबादी करीब 50 लाख है तो वहीं दूध का उत्पादन करीब 40 हजार लीटर प्रतिदिन है। एक किलोग्राम मावा तैयार करने में करीब चार से पांच लीटर दूध लगता है। इस हिसाब से डिमांड के सापेक्ष प्रतिदिन हो रहे दूध उत्पादन से मावा की डिमांड पूरी होना संभव नहीं है। ऐसे में कुछ लोग मिलावट करके व सिंथेटिक तरीके से नकली मावा बनाकर मोटा मुनाफा कमाने के चक्कर में रहते हैं।
इसके लिए दूध में यूरिया, डिटर्जेंट पाउडर और घटिया क्वालिटी का वनस्पति घी मिलाया जाता है। सिंथेटिक दूध बनाने के लिए वॉशिंग पाउडर, रिफाइंड तेल, पानी और शुद्घ दूध को आपस में मिलाया जाता है। इस तरह एक लीटर दूध में 20 लीटर सिंथेटिक दूध तैयार करते हैं, फिर इसी दूध से मावा तैयार किया जाता है। इतना ही नहीं मावा को आकर्षक रंग देने के लिए केमिकलों का भी इस्तेमाल होता है, जो सेहत के लिए काफी नुकसानदेह है। नकली मावा की मात्रा बढ़ाने के लिए आलू का इस्तेमाल किया जाता है। चिकित्सक के मुताबिक, मिलावटी मावा से बनी गुझिया और मिठाइयां किडनी से लेकर लिवर तक खराब कर सकती हैं। सांस नली में दिक्कत कर सकती हैं। वहीं पेट के अन्य जरूरी अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
ऐसे पहचानें मिलावट - खाद्य सुरक्षा अधिकारी विवेक वर्मा बताते हैं कि असली मावा की पहचान के लिए आयोडीन टिंचर की मावा में दो-तीन बूंद डालें। असली मावा होने पर रंग लाल हो जाएगा। मिलावट होने पर मावा का रंग काला हो जाएगा। इसी तरह शुद्ध मावा रगडने पर चिकनाहट छोड़ता है, जबकि मिलावटी मावा मसलने में बत्ती बनकर अलग-अलग हो जाता है।