लखीमपुर खीरी। अस्थमा पहले से ही एक खतरनाक बीमारी है और कोरोना के दौर में यह जानलेवा साबित हो सकती है। कोरोना काल में हर किसी को लगभग सांस लेने में समस्या थी। ऐसे में अस्थमा के रोगी के लिए कोरोना काल काफी घातक सिद्ध हुआ था और कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे थे।
अस्थमा के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिये प्रत्येक वर्ष तीन अप्रैल को विश्व अस्थमा दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करना है, क्योंकि इसके होने की मुख्य वजह धूम्रपान, धूल, प्रदूषण एवं जीवनशैली में बदलाव है। डॉक्टरों का कहना है कि जागरूकता ही इस बीमारी से बचाव और इलाज है। हालांकि कुछ दवाओं का सेवन कर और एहतियात बरत कर इसको काबू तो किया जा सकता है, लेकिन पूर्णतया छुटकारा पाना मुश्किल है।
जिला अस्पताल के चेस्ट फिजीशियन डॉ. आइके राम चंदानी बताते हैं कि अस्थमा एवं दमा फेफड़ों की बीमारी है। इससे पीड़ित मरीज को सांस लेने में तकलीफ, सीने में दबाव और खांसी आदि आने लगती है। ये सारी समस्याएं श्वसन नलियों में रुकावट के कारण होती है।
उन्होंने बताया कि बढ़ता वायु प्रदूषण और बदलती जीवन शैली के कारण अस्थमा की बीमारी अधिक लोगों को अपना शिकार बना रहा है। ऐसा कोई दिन नहीं होता, जिस दिन आठ से दस मरीज इसके ओपीडी में आते न हों। उन्होंने बताया कि इसके अलावा माता-पिता में से किसी को अस्थमा होने पर बच्चों में भी इसके होने की आशंका बढ़ जाती है।