लखीमपुर खीरी। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली आशा कार्यकर्ताओं को बेहतर मानदेय की आस है। वे वर्षों से स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने का अहम काम कर रही हैं।
टीकाकरण, सुरक्षित प्रसव, मातृ एवं शिशु देखभाल, कुपोषण की पहचान और संक्रामक रोगों की निगरानी जैसे अभियानों की सफलता काफी हद तक उनकी मेहनत पर निर्भर करती है। वे न तो पूर्णकालिक सरकारी कर्मचारी हैं और न ही केवल स्वयंसेवक, बल्कि दोनों के बीच की वह मजबूत कड़ी हैं, जिन पर पूरी व्यवस्था टिकी है।
दिन हो या रात, गर्मी हो या ठंड, आशा कार्यकर्ता हर परिस्थिति में गांव के लोगों के साथ खड़ी रहती हैं। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाना, टीकाकरण के लिए प्रेरित करना, बच्चों का वजन मापना और बीमारियों की सूचना विभाग तक पहुंचाना, ये सब काम आशाओं की दिनचर्या का हिस्सा हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिला है और न ही पर्याप्त सुविधाएं मिल पाईं।
हम गांव-गांव जाकर लोगों को समझाते हैं। कई बार अपनी जेब से रुपये खर्च करने पड़ते हैं लेकिन संतोष इसी बात का है कि लोगों को सही इलाज मिल रहा है।
- रकिया बानो
जिम्मेदारी बहुत बड़ी है, मगर मानदेय समय पर नहीं मिलता। फिर भी काम नहीं रोक सकते। अगर सुविधाएं मिल जाएं तो काम और अच्छा हो सकता है।
- सीमा देवी
कोरोना जैसी आपदा में भी हमने घर-घर जाकर सर्वे किया, तब हमारी अहमियत सबने देखी। दिक्कत रुपयों की रहती है। अपने पास से राशि खर्च कर जाना पड़ता है।
- भुवनेश्वरी देवी
अगर हमें सम्मान और सुरक्षा और समय से भुगतान मिले तो मिले तो हम और बेहतर काम कर सकते हैं। इसी उम्मीद में काम कर रहें है कि भुगतान समय से होगा।
- सुषमा देवी
रकिया बानो
रकिया बानो
रकिया बानो