बबुरी और खैर के जंगल के बीच था मंदिर
जानकारों के अनुसार कालांतर में लिलौटी धाम काफी बड़े भू भाग में फैला था। बबुरी और खैर के जंगल थे। इस बीच शिवलिंग मिलने से स्टेट की महारानी की इच्छा पर राजाओं ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। समय के साथ जंगल कटते गए। करीब दस एकड़ का क्षेत्रफल आज भी यहां की हरियाली और शांत वातावरण भक्तों को आकर्षित करती है। अरसे से श्रद्धालु इसे पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग कर रहे हैं।
कपाट खुलने पर पूजित मिलता है शिवलिंग
पौराणिक लिलौटी मंदिर सुबह चार बजे खुल जाता है। महंत रोहित गिरी बताते हैं कि रात गर्भ गृह और प्रांगण की साफ सफाई कर मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं। भोर होते ही कपाट खुलते हैं तो शिव लिंग पर पुष्प, बेलपत्र, अक्षत चढ़ा मिलता है। किदवंती है कि अश्वत्थामा और आल्हा उदल पूजन करने आते हैं। इससे इस स्थान की महत्ता और बढ़ जाती है।
अमावस्या पर लगता है मेला
लिलौटी मंदिर परिसर में हर आमावस्या पर मेला लगता है। भंडारे और प्रसाद का वितरण होता है। स्थानीय और जिले के अन्य जगहों के दुकानदार खिलौने, मिठाई, लकड़ी घरेलू समान की दुकानें लगाते हैं। चारों ओर जंगल की हरियाली और जूनई कंडवा के संगम किनारे लोग बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं।