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Sawan 2023: महाभारतकालीन लिलौटीनाथ मंदिर में स्थापित है एकमुखी शिवलिंग, आज भी अश्वत्थामा करते हैं प्रथम पूजन

Mon, 17 Jul 2023 12:49 AM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी

सार

लिलौटी धाम में स्थापित एक मुखी शिवलिंग में आकृति उभरी हुई है, जिसे श्रद्धालु माता पार्वती का स्वरूप मानते हैं। कहा जाता है कि शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। सुबह काला, दोपहर भूरा और रात में शिवलिंग सफेद रंग का हो जाता है।
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महाभारतकालीन लिलौटीनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लखीमपुर खीरी के महेवागंज में महाभारतकालीन लिलौटी नाथ शिव मंदिर अपनी महत्ता और पौराणिकता के लिए विख्यात है। शहर से करीब पांच किलोमीटर दूर जुनई और कंडवा नदी के बीच स्थित लिलौटीनाथ मंदिर सुरम्य प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित है। बताया जाता है कि द्वापर युग में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। किदवंती है कि अश्वत्थामा और आल्हा उदल ही इस मंदिर में पहली पूजा करते है। कपाट खुलने से पहले शिवलिंग पूजित मिलता है।

रंग बदलता है शिवलिंग

लिलौटी धाम में स्थापित एक मुखी शिवलिंग में आकृति उभरी है, जिसे श्रद्धालु माता पार्वती का स्वरूप मानते हैं। कहा जाता है कि शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। सुबह काला, दोपहर भूरा और रात में शिवलिंग सफेद रंग का हो जाता है। मंदिर में वैसे तो प्रतिदिन भक्तों का आना जाना रहता है, लेकिन सावन में हजारों शिवभक्तों की भीड़ उमड़ती है। अमावस्या को मेला लगता है।

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राजाओं ने कराया था जीर्णोद्धार

महेवा स्टेट के राजाओं ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। अब मंदिर समिति पर मंदिर की देखभाल का जिम्मा है। मंदिर में पंचमुखी हनुमान, सूर्य देव, मां दुर्गा, विष्णु जी और घाट पर दक्षिणेश्वर शिव विराजमान हैं। जिले के आलावा दूर दराज से भी श्रद्धालु पूजन और मनौती मांगने आते हैं।

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बबुरी और खैर के जंगल के बीच था मंदिर

जानकारों के अनुसार कालांतर में लिलौटी धाम काफी बड़े भू भाग में फैला था। बबुरी और खैर के जंगल थे। इस बीच शिवलिंग मिलने से स्टेट की महारानी की इच्छा पर राजाओं ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। समय के साथ जंगल कटते गए। करीब दस एकड़ का क्षेत्रफल आज भी यहां की हरियाली और शांत वातावरण भक्तों को आकर्षित करती है। अरसे से श्रद्धालु इसे पर्यटन स्थल घोषित करने की मांग कर रहे हैं। 

कपाट खुलने पर पूजित मिलता है शिवलिंग

पौराणिक लिलौटी मंदिर सुबह चार बजे खुल जाता है। महंत रोहित गिरी बताते हैं कि रात गर्भ गृह और प्रांगण की साफ सफाई कर मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं। भोर होते ही कपाट खुलते हैं तो शिव लिंग पर पुष्प, बेलपत्र, अक्षत चढ़ा मिलता है। किदवंती है कि अश्वत्थामा और आल्हा उदल पूजन करने आते हैं। इससे इस स्थान की महत्ता और बढ़ जाती है।
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अमावस्या पर लगता है मेला 

लिलौटी मंदिर परिसर में हर आमावस्या पर मेला लगता है। भंडारे और प्रसाद का वितरण होता है। स्थानीय और जिले के अन्य जगहों के दुकानदार खिलौने, मिठाई, लकड़ी घरेलू समान की दुकानें लगाते हैं। चारों ओर जंगल की हरियाली और जूनई कंडवा के संगम किनारे लोग बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं।
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