तीन बार बने निघासन के विधायक, आज भी दी जाती है सादगी की मिसाल
जिले के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और विशुद्ध गांधीवादी करन सिंह निघासन विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे। उन्हें सरलता और सादगी की जीती-जागती मिसाल माना जाता था। कांग्रेस पार्टी की ओर से पहली बार वह 1952 में चुनाव लड़कर विधायक बने। इसके बाद 1967 और 1969 का भी चुनाव जीता। विधायक बनने के बाद भी उनकी सादगी में कोई कमी नहीं आई। चुनाव में ही वह जीप पर दिखाई देते थे, इसके बाद साइकिल ही क्षेत्र में घूमने का जरिया हुआ करती थी।
विधायक बनने के बाद भी उन्हें लखीमपुर आना होता तो बस से आते थे, लखनऊ जाना होता तो ट्रेन पकड़ते थे। घर होते तो दिन में एक बार साइकिल उठाकर अपने खेतों पर जरूर जाते थे। साथ में खेतों पर काम करने वाले मजदूरों का खाना भी ले जाते थे। जितनी देर मजदूर खाना खाते थे, उतनी देर वह हल उठाकर खुद खेतों में जुट जाया करते थे। उनके पास आने वाले फरियादी कभी नहीं निराश नहीं लौटते थे। लखनऊ का उनका विधायक निवास सभी के लिए खुला रहता था। वह सभी से कोई न कोई रिश्ता बना लेते थे, उसी के मुताबिक उसे संबोधित करते थे और सम्मान भी देते थे।
निघासन के 90 वर्षीय वैद्य राजकुमार पांडेय बताते हैं कि 1952 में जब पहला चुनाव हुआ तो निघासन में कांग्रेस ने करन सिंह को मैदान में उतारा तो उनके पास चुनाव लड़ने के लिए कोई संसाधन नहीं था। पार्टी ने चुनाव प्रचार के लिए एक पुरानी जीप दे दी। लेकिन कभी दूरदराज के गांवों में जाना होता था तभी वह जीप इस्तेमाल करते थे वरना साइकिल से ही जनसंपर्क पर निकलते थे। कई जगह जीप का पहुंचना भी मुमकिन नहीं होता था, वहां वह लहडू़ से पहुंचते थे। उन्होंने सभी चुनाव बेहद सादगी से लड़े। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि चुनाव प्रचार करते हुए कभी रास्ते में उनका कोई प्रतिद्वंद्वी मिल जाता तो रुककर उसके गले लगकर हालचाल जरूर पूछते थे।
निघासन के 90 वर्षीय वैद्य राजकुमार पांडेय से बातचीत पर आधारित