इससे पहले भी हो चुकी हैं कई घटनाएं
तिकुनियां। बार्डर पर स्थित ग्राम सूरतनगर के मजरा गांव चौर्गुजी में हाथियों के साथ एक दशक से ग्रामीण संघर्ष कर रहे हैं। चूंकि यह गांव बार्डर पर मोहना नदी के पार बसा है। गांव में मल्लाह बिरादरी के करीब एक सौ से अधिक परिवार निवास करते हैं। इन परिवारों के जंगल से सटे खेत हैं। गांव से सटा बहराइच जिले का जंगल भी है। इस जंगल के हाथी वर्षों से उत्पात मचाते आ रहे हैं।
मृतक मनोहर के पिता सोखीलाल का कहना है कि गांव के सीताराम मुंशी और परवन को हाथी घायल कर चुके हैं। इसके अलावा करीब 12 छप्परनुमा घर उजाड़ चुके हैं। हाथियों की संख्या करीब 12 है, जो अलग-अलग समूह में घूमते हैं और शाम होते ही फसलों को उजाड़ने लगते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों द्वारा उजाड़ी गई फसलों का उन्हें कभी मुआवजा नहीं मिला।
चौर्गुजी गांव से कुछ दूरी पर एसएसबी चौकी भी है। वन विभाग का कहना है कि मनाही के बावजूद भी ग्रामीण जंगल में घुस जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों के हमले के डर से ग्रामीण रात जाग कर गुजार रहे हैं। वर्षों से आबाद गांव के लोग जंगली हाथियों से अपनी जान बचाकर कहां जाएं। इसके लिए प्रशासन भी कोई रास्ता नहीं निकाल रहा है।
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अक्सर शाम को ही जंगल से निकले हैं हाथी
तिकुनियां। बहराइच जंगल जंगल से हाथी अक्सर शाम के समय ही जंगल से निकलते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों से बचाव के लिए मशाल जलाकर व पीपे पीट कर उन्हें खेत व गांव में घुसने से रोका जाता है।
बार्डर के गांव रामनगर, खैरेटिया, सूरतनगर व चौर्गुजी के लोग हाथियों की दहशत में फसलों की रखवाली करते हैं।