फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

करोड़ के बजट के बाद भी महफूज नहीं है दुधवा के बाघ

Tue, 29 May 2012 12:00 PM IST
Lakhimpur
विज्ञापन
विज्ञापन
पलियाकलां। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण के लिए करोड़ रु पए का सालाना बजट होने के बाद भी बाघ महफूज नहीं रह गए हैं। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की मदद भी बेकार साबित हो रही है। संरक्षण का कार्य कागजों तक ही सीमित रह गया है।
विज्ञापन

देश में बचे बाघों को बचाने के लिए सरकार द्वारा चलाया जा रहा अभियान दुधवा टाइगर रिजर्व में दम तोड़ता नजर आ रहा है। सरकार सलाना बजट में रिजर्व को रखरखाव के लिए करोड़ रुपए का बजट देती है, लेकिन इसके बाद भी संरक्षण का कार्य जीरो है। मानीटरिंग, सुरक्षा और रखरखाव के लिए अलग से भी कई सुविधाए मिलने के बावजूद बाघों के प्रति कोई भी फि क्रमंद नजर नहीं आ रहा है। दुधवा में बाघों के शव पड़ होते हैं और कई कई दिन कर्मचारियों को खबर ही नहीं होती है। सरकार की मंशा है कि रुपयों की से मानीटरिंग में कोई कमी न आए और रखरखाव भी ठीक ठाक रहे, लेकिन हालात देखकर यही लगता है कि संरक्षण कार्य के नाम पर कुछ भी नहीं किया जा रहा और बाघ कभी बाहर भाग रहे हैं तो कभी उनकी मौत हो रही है। करोड़ के सालाना बजट में रिजर्व क्षेत्र में पानी के वाटर होल, उनमें पानी भरना, गस्त के लिए कर्मियों को सुविधाएं देना, अधिकारियों की पेट्रोलिंग के लिए वाहन की व्यवस्था आदि शामिल है। कर्मियों को यूनीफार्म, साईकिल वितरित करने के साथ कई अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं, लेकिन जंगल में वाटर होल का बुरा हाल है और पानी की कमी से जीवों का बुरा हाल हो चुका है। सूत्रों की मानें तो कागजों पर वाटर होलों में पानी भी भरा जा रहा है और इसमें डीजल भी खर्च हो रहा है, लेकिन वास्तविकता में स्थिति कुछ और ही है। गस्त के हाल सबके सामने है कि बाघ का शव कई दिन पड़ रहा और किसी को कानों कान खबर भी न हुई। कर्मचारी काम कर रहे हैं या नहीं इसके निरीक्षण के लिए अधिकारियें को वाहन मुहैया कराए जाते हैं, लेकिन अधिकारियों का निरीक्षण भी खानापूर्ति में ही निपट जाता है। यहां दुधवा नेशनल पार्क की भी कई घटनाएं उदाहरण हैं। एक गैंडा, एक हाथी मर गया और इसके साथ ही साठियाना रेंज से सैकड़ पेड़ भी काट लिए गए, लेकिन अधिकारियों को इसकी भनक तक न लगी। निरीक्षण होता तो शायद कर्मचारी भी यह लापरवाही और कामचोरी न कर पाते। यही स्थिति बाघों के साथ भी है। फिलहाल यह सब खामियां बड़ गोलमाल की ओर इशारा करती नजर आ रहीं और इससे दुनियां से लुप्त हो रही इस प्रजाति को बचाने के मकसद पर पानी फिरता नजर आ रहा है। हालात यही रहे तो टाइगर रिजर्व का सिर्फ नाम ही रह जाएगा और बाघ यहां देखने को नसीब नहीं होंगे।
बाक्स....
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और डब्ल्यूटीआई भी देती है मदद
दुधवा टाइगर रिजर्व को डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और डब्ल्यू टीआई भी सालाना करोड़ रुपए की मदद देती है। इसमें गस्त करने वाले कर्मियों को यूनीफार्म, साइकिल, टार्च, अधिकारियों को वाहन, दिए जाते है। इसके अलावा मानसून सत्र में रेनकोट से लेकर कई बुनियादी सामान भी मुहैया कराए जाते हैं, लेकिन इन सब के बावजूद न तो कर्मी गस्त करते हैं और न ही अधिकारियों का निरीक्षण होता है।
विज्ञापन

बाक्स
मिले वाहन अधिकारियों के करते हैं निजी काम
संस्थाओं और सरकार से मिले वाहन अधिकारियों के निजी कार्यो में लगे रहते हैं। सूत्रों की मानें तो अभी हाल ही मिले वाहन एक अधिकारी के घर की शोभा बढ़ रहे हैं।
विज्ञापन

-महबूब आलम-अशोक निगम
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें