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अस्पताल मरीजों से फुल, डीजी बता रहे बुखार पीड़ित 20 फीसदी
बुखार का समाधान नहीं, 14 की मौत होना बता गए डीजी
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी। जिले में बुखार महामारी की तरह फैला है। बुखार से अब तक 50 से अधिक मौतें हो चुकी हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग बुखार पीड़ितों के इलाज के इंतजाम के बजाय मौतों के आंकड़े दुरुस्त करने में जुटा है। गुरुवार को लखनऊ से आए महानिदेशक चिकित्सा (डीजी-हेल्थ) डॉ. पद्माकर सिंह ने भी पूरा जोर इसी में लगाया। सबसे पहले 45 मिनट तक वह सीएमओ दफ्तर में बैठकर जानकारी जुटाते रहे, फिर 25 मिनट के निरीक्षण में उन्होंने मरीजों से सिर्फ दो सवाल किए। पहला-दवा मिली? दूसरा-खाना मिला? वह जवाब सुनते और आगे बढ़ जाते। खास बात यह रही कि अभी तक सीएमओ डॉ. मनोज अग्रवाल बुखार से सिर्फ एक मौत मान रहे थे। जबकि डीजी ने 14 मौतें होना स्वीकार की हैं।
गुरुवार की सुबह से ही डीजी के दौरे को लेकर खबरें वायरल होने लगीं, जिसके बाद दौरा निरस्त होने की खबर आई। दोपहर बाद अचानक डीजी के दौरे की खबर आने लगी। करीब 2.15 बजे डीजी डॉ. पद्माकर सिंह सबसे पहले सीएमओ आफिस पहुंचे, जहां बंद कमरे में 45 मिनट तक वह सीएमओ डॉ. मनोज अग्रवाल, सीएमएस डॉ. आरके वर्मा, डॉ. मीरा वर्मा और डीएमओ एसके वर्मा के साथ बैठकर चर्चा करते रहे। इसके बाद डीजी अन्य अधिकारियों के काफिले संग आईसीयू वार्ड पहुंचे, जहां एईएस पीड़ित दो बच्चे भर्ती थे। डीजी ने तीमारदारों से दवा मिलने की बात पूछी। इसी दौरान कुछ कर्मचारी आईसीयू वार्ड की वेंटिलेटर मशीन को ठीक करने में जुटे, जिस पर डीजी ने गौर नहीं किया। इसके बाद डीजी चिल्ड्रेन वार्ड पहुंचे, जहां उन्होंने भर्ती बच्चों के तीमारदारों से दवा मिलने की बात पूछी। इसी दौरान सीएमएस के इशारे पर डॉक्टर ने डीजी को जवाब देने की खुद ही कमान संभाल ली, ताकि तीमारदार कुछ और न बोल सकें। इमर्जेंसी वार्ड में मरीज और तीमारदारों की बेतरतीब भीड़ मिली, तो सीएमएस डॉ. आरके वर्मा ने बताया कि दशकों पुरानी व्यवस्था के मुताबिक एक ईएमओ, एक फार्मेसिस्ट की ड्यूटी रहती है। अब व्यवस्था में बदलाव की मांग रखी, लेकिन डीजी इस पर कुछ नहीं बोले। वार्ड के मरीजों को देखा और यहां भी दवा मिलने की बात पूछी। पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कुपोषित बच्चों के अभिभावकों से डीजी ने खाना मिलने के बारे में पूछा। इसके बाद डीजी ने मेडिसिन स्टोर, सर्जिकल वार्ड और सीटी स्कैन कक्ष का भी निरीक्षण किया।
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मेन गेट से लेकर शौचालय मिले गंदे
डीजी का निरीक्षण के दौरान पहले मेन गेट पर ही भरे गंदे पानी से सामना हुआ, हालांकि वह गाड़ी में थे। निरीक्षण के दौरान शौचालयों में गंदगी दिखी। इस पर डीजी ने सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए निर्देश दिए। तो सीएमओ ने एक स्थायी जेई की तैनाती करने की मांग डीजी से की।
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दवाएं पर्याप्त पर डॉक्टरों की कमी
डीजी ने बताया कि दवाओं की कमी नहीं है, बल्कि डॉक्टरों की कमी जरूर है। उन्होंने बताया कि डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए निरंतर प्रयास जारी है। इसके लिए डॉक्टरों की सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाकर 62 वर्ष किया गया है।
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14 मौतें, जेई से एक भी नहीं
पत्रकारों से वार्ता के दौरान डीजी ने बताया कि जनपद में अब तक 14 बच्चों की मौतें हुई हैं, जिनमें जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) से एक भी मौत नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि 64 एईएस प्रभावित मरीज मिले हैं, जबकि तीन जेई प्रभावित मिले। 25 हजार स्लाइड बनाई जा चुकी हैं। 63 मलेरिया के रोगी मिले हैं। उन्होंने एंबुलेंस सेवा की कमियों को दूर करने के सवाल पर बताया कि 712 नई एंबुलेंस खरीदी जा चुकी हैं और 662 एंबुलेंस की खरीद प्रक्रिया चल रही है। जल्द ही जनपद को कई एंबुलेंस मिल जाएंगी।
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जमीन पर लेटे मरीज ने बढ़ाई स्टाफ की धड़कनें
डीजी के दौरे की जानकारी जिला अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ को मिल चुकी थी। लिहाजा अस्पताल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में सभी जुटे थे। इसी दौरान इमर्जेंसी के बाहर जमीन पर तीमारदारों ने मरीज को लिटा दिया और एंबुलेंस के आने का इंतजार करने लगे। तभी मीडिया के फोटोग्राफर ने जमीन पर लेटे मरीज की फोटो खींचनी शुरू की, जिससे स्टाफ की धड़कनें बढ़ गईं। आनन-फानन में मरीज को बेड मुहैया कराया गया।
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सिर्फ औपचारिकता निभाई
लखीमपुर खीरी। डीजी हेल्थ डॉ. पद्माकर सिंह के दौरे से एकबारगी स्वास्थ्य सेवाओं में कुछ बेहतरी की उम्मीद थी, लेकिन उनका दौरा महज औपचारिकता में सिमट गया। पहले निरीक्षण करने के बजाय डीजी ने अस्पताल की बदइंतजामी दुरुस्त करने का भरपूर मौका अधिकारियों को दिया। इसलिए पहले सीएमओ दफ्तर में बैठकर डीजी 45 मिनट तक बंद कमरे में अधिकारियों से वार्ता करते रहे। तब तक जिला अस्पताल और महिला अस्पताल में अव्यवस्थाओं को आसानी से दुरुस्त कर दिया गया। इसके बाद ही वह सीएमओ के दफ्तर से निकलकर आईसीयू वार्ड और जिला अस्पताल पहुंचे, जहां पर उनका निरीक्षण साधारण रहा। निरीक्षण के दौरान न तो एक्शन में दिखे और न ही कोई कार्रवाई की।