लावारिस जानवर बन रहे बाघों का निवाला
लखीमपुर खीरी। तराई के जंगलों से निकलकर गन्ने के खेतों में डेरा डालने वाले बाघ इन दिनों लावारिस घूमने वाले मवेशियों को अपना निवाला बना रहे हैं। गन्ने के खेतों में रहने वाले इन बाघों को तो अब शुगर केन टाइगर्स का नाम भी मिल चुका है। मोहम्मदी-महेशपुर रेंज में सक्रिय बाघ पिछले एक साल से लगातार खेतों में भ्रमण करने वाले लावारिस मवेशियों को अपना निवाला बना रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ और वनाधिकारियों को आशंका है कि गन्ने के खेतों में रहने के आदी हो चुके बाघों को गाय-बैल खाने की आदत न पड़ जाए।
तराई क्षेत्र में गन्ना उत्पादन बढ़ने के साथ ही खीरी, पीलीभीत और बहराइच समेत तराई के जिलों में बाघों के जंगल से निकलकर गन्ने के खेतों को बसेरा बनाने की प्रवृत्ति शुरू हुई। मौजूदा समय में तो हालत यह है कि जितने बाघ जंगल में हैं करीब उतने ही बाघ गन्ने के खेतों में विचरण कर रहे हैं। अब तो इन बाघों को जंगल की अपेक्षा गन्ने के खेत ज्यादा रास आ रहे हैं। तराई के बाघों के बदलते स्वभाव पर अध्ययन करने वाले जाने माने वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. राहुल शुक्ला ने अपनी पुस्तक में गन्ने के खेतों में रहने वाले बाघों को शुगर केन टाइगर्स का नाम दिया है। उनका कहना है कि गन्ने के खेत भी बाघों के लिए पूरी तरह अनुकूल प्राकृतिक वास हैं।
अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि जो बाघ गन्ने के खेतों में रहने के आदी हो जाते हैं। वह वापस जंगल मुश्किल से ही लौटते हैं। अतिक्रमण के कारण कम होता जंगल का एरिया और बढ़ती बाघों की संख्या के कारण बाघ गन्ने के खेतों को अपनी टेरीटरी बना रहे हैं। इसी के चलते तराई में मानव और बाघों के बीच संघर्ष की घटनाओं में भी बढ़ोत्तरी हो रही है। यह समस्या अब वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।