शहर की रामलीला जिले की अनमोल सांस्कृतिक विरासत है। यह अपने में गौरवशाली परंपरा और रोचक इतिहास संजोए है। 153 साल पुरानी इस ऐतिहासिक रामलीला की शुरुआत कराने का श्रेय एक अंग्रेज महिला को जाता है। स्थानीय कलाकार पूरी श्रद्धा और धार्मिक भावनाओं के साथ रामलीला का मंचन करते हैं।
मोहम्मदी से लखीमपुर खीरी जिला बनने के कुछ साल बाद वर्ष 1863 में अंग्रेज कलक्टर मि. बाटले बनारस से यहां तबादले पर आए थे। उनकी पत्नी हेरिस मारिया भारतीय संस्कृति और परंपराओं से बहुत प्रभावित थीं। उन्होंने बनारस के रामनगर की रामलीला देखी थी जो उन्हें बहुत पसंद आई। जब उन्हें यह पता चला कि लखीमपुर में रामलीला नहीं होती है तो उन्होंने अपने पति से यहां रामलीला शुरू कराने की इच्छा जताई। इस पर कलक्टर बाटले ने शहर के संभ्रांत लोगों को बुलाकर उन्हें अपनी पत्नी की इच्छा से अवगत कराया और यहां भी रामलीला की शुरुआत करने का आग्रह किया।
सेठ मथुरा प्रसाद ने शहर में रामलीला आयोजन की जिम्मेदारी ली। लखीमपुर में पहली रामलीला 1864 में हुई। मिसेज बाटले चाहती थीं कि उनके पति के तबादले के बाद भी यहां रामलीला का आयोजन जारी रहे। इसके लिए उन्होंने रामलीला में सहयोग करने वाले लोगों को बुलाकर एक कमेटी बना दी। इस कमेटी के संचालन की मुख्य जिम्मेदारी सेठ मथुरा प्रसाद के पास ही रही।
अब गया प्रसाद ट्रस्ट कराता है रामलीला
रामलीला के सफल संचालन के लिए 1933 में सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट की स्थापना की गई। ट्रस्ट की आय के लिए संसाधनों की व्यवस्था की गई। सेठ गया प्रसाद के बाद बराती लाल, श्रीराम मेहरोत्रा, फिर ओमकार नाथ मेहरोत्रा, अजय मेहरोत्रा और अब विपुल सेठ मुख्य सरवराकार के रूप में रामलीला का सफल संचालन कर रहे हैं।
लाल किताब है यहां की रामलीला का संविधान
रामलीला का आयोजन कैसे हो, पात्रों का विवरण, पात्रों की अर्हता, पात्रों का चयन, उनके वस्त्र आभूषण और श्रंगार, सवारी निकलने और राम बारात निकलने के रास्ते से लेकर मंचन का तरीका और व्यवस्था आदि सारा विवरण इस लाल किताब में दर्ज है। यह हस्तलिखित किताब कमेटी गठन के समय ही तैयार की गई थी। यह लाल किताब यहां की रामलीला का संविधान है।
गंगा जमुनी संस्कृति की प्रतीक है रामलीला
लखीमपुर में होने वाली रामलीला गंगा जमुनी संस्कृति की प्रतीक है। यहां पात्रों के कपड़े सिलने का काम वयोवृद्ध मुन्ने मियां पिछले 63 साल से यह काम करते आ रहे हैं। इससे पहले उनके ससुर इलाही बख्श पात्रों के कपड़े सिलते थे। मुन्ने मियां का कहना है कि अपने जीते जी वह यह काम करते रहेंगे। उनकी इच्छा है कि उनके बाद उनके बेटे यह काम करें।
...और मथुरा भवन बन गया लघु अयोध्या
रामलीला यूं तो रामलीला मैदान में होती है लेकिन इसका संचालन मथुरा भवन से होता है। तैयारियों के चलते मथुरा भवन ने लघु अयोध्या का रूप ले लिया है। वहां उत्सव जैसा माहौल है। रामलीला शुरू होने के दिन से समापन तक सेठ परिवार की महिलाएं और पुरुष उपवास रखते हैं। सुबह भगवान की भूमिका निभाने वाले पात्रों की पूजा करने और भोग लगाने के बाद ही फलाहार करते हैं। दोनों समय पात्रों की आरती उतारी जाती है।