तिकुनियां/ बेलरायां (लखीमपुर खीरी)। सिंचाई विभाग जर्जर नाव और सात मजदूरों के सहारे डॉक्टर घाट पर कटान रोकने की कवायद कर रहा है। तेज बहाव व कटान के सामने काम की गति काफी धीमी है। इससे बाढ़ पीड़ितों की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रही है। मजदूर मिट्टी भरी बोरियां जर्जर नाव से लाकर कटान स्थल पर लगा रहे हैं। खासबात यह है कि मजदूर जितनी बोरी लगा पाते हैं, उसमें से आधे से अधिक बोरियां मोहाना नदी के तेज बहाव में मिट्टी के घुल जाने से बह जा रही हैं। इससे सिंचाई विभाग के कार्यों पर सवाल उठने लगे हैं।
भारत-नेपाल सीमा के मध्य बह रही मोहाना नदी हर साल बरसात के मौसम में सीमावर्ती गांवों में कहर बरपाती है। जहां कई गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं, वहीं भू-कटान भी तेजी से होने लगता है। नदी एक दिन में 10 से 15 फिट जमीन निगल रही है। दस सालों में अब तक नदी एक हजार एकड़ से अधिक जमीन फसल समेत निगल चुकी है। वर्तमान समय से कटान का वेग काफी तेज है। नदी डॉक्टर घाट और रघुनंदन टाडा (चैगुर्जी घाट) गांव के पास कटान कर रही है। डॉक्टर घाट पर सिंचाई विभाग कटान रोकने का काम पांच से सात मजदूर की दम पर कर रहा है। नदी पार से मजदूर जर्जर नाव में मिट्टी भरकर बैग लाकर लगाते हैं, लेकिन मोहना लगाए गए आधे से अधिक बैग बहा ले जाती है। कटान पीड़ित परमजीत सिंह, निक्कू, कर्मजीत सिंह आदि बताते हैं कि इतनी धीमी गति से कार्य होने से क्या फायदा, जितना काम होता है। वाह अगले दिन पानी के वेग के आगे बेकार हो जाता है। कुल मिलाकर सिंचाई विभाग का ध्यान कटान रोकने में कम बजट निपटाने में अधिक लगा हुआ है। क्योंकि बरसात के मौसम में बांस और मिट्टी भरे बैग के सहारे कटान रोकने की योजना स्थायी नहीं है। इससे बड़ा बजट पानी में बहाने की आशंका बढ़ गई है।
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दस दिन से नहीं आया लेखपाल
गंगानगर निवासी सुच्चा सिंह, सुबेग सिंह बताते हैं कि नदी का कटान बहुत तेज है। ऐसे ही रहा तो घर कटने का नंबर जल्दी ही आ जायेगा। उन्होंने बताया कि दस दिन पूर्व लेखपाल आया था और कह गया था कि अपने अपने कागज संभाल कर रखो। आकर सर्वे करूंगा, लेकिन वह आज तक नहीं लौटा।
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